Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 45
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Govind
LSK 1022
यत्-प्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
राजश्वशुराद्यत्
Aṣṭādhyāyī 4.1.137
Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

१०२२- राजश्वशुराद्यत्। राजा च श्वशुरश्च तयोः समाहारद्वन्द्वो राजश्वशुरम्, तस्मात्। राजश्वशुरात् पञ्चम्यन्तं, यत् प्रथमान्तं, द्विपदं सूत्रम्। तस्यापत्यम् की अनुवृत्ति और प्रत्ययः, परश्च, इत्याप्प्रातिपदिकात्, तद्धिताः, समर्थानां प्रथमाद्वा का अधिकार चल रहा है।

राजन् और श्वशुर शब्दों से अपत्य अर्थ में यत् प्रत्यय होता है।

तकार की इत्संज्ञा होती है, य शेष रहता है। तित् होने का फल स्वरप्रकरण में तित्स्वरितम् की प्रवृत्ति है।

राज्ञो जातावेवेति वाच्यम्। यह वार्तिक है। राजन् शब्द से जाति वाच्य होने पर ही यत् प्रत्यय कहना चाहिए। तात्पर्य यह है कि राजन् शब्द से यत् प्रत्यय किये जाने पर भी उसमें जाति अर्थ की विशेषता होनी चाहिए अर्थात् इस शब्द से अपत्यार्थ में यत् प्रत्यय तभी होगा जब प्रकृतिप्रत्ययसमुदाय से जाति अर्थ की प्रतीति होगी।