चादण्। कानीनो व्यासः कर्णश्च।
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१०२१- कन्यायाः कनीन च। कन्यायाः षष्ठ्यन्तं, कनीन लुप्तप्रथमाकं, च अव्ययपदं, त्रिपदं सूत्रम्। शिवादिभ्योऽण् से अण् और तस्यापत्यम् इस पूरे सूत्र की अनुवृत्ति आती है। प्रत्ययः, परश्च, ङ्याप्प्रातिपदिकात्, तद्धिताः, समर्थानां प्रथमाद्वा का अधिकार आ रहा है।
अपत्य अर्थ में कन्याशब्द के स्थान पर कनीन आदेश होता है और उससे परे अण् प्रत्यय भी होता है।
यह सूत्र स्त्रीभ्यो ढक् का अपवाद है।
कानीनो व्यासः कर्णश्च। कन्या अर्थात् अविवाहिता की सन्तान, व्यास या कर्ण आदि। कन्याया अपत्यं पुमान् लौकिक विग्रह है। कन्या इस् में कन्यायाः कनीन च से कन्या के स्थान पर कनीन आदेश और अण् प्रत्यय का विधान हुआ। प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके कनीन+अ बना। आदिवृद्धि, भसंज्ञक अवर्ण का लोप करके कानीन बना। स्वादिकार्य करके कानीनः सिद्ध हुआ। व्यास, कर्ण आदि अविवाहित माँ के पुत्र थे।