Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 45
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VṛttiGovind
LSK 1020
ढक्-प्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
स्त्रीभ्यो ढक्
Aṣṭādhyāyī 4.1.120
Vṛtti Varadarājācārya

स्त्रीप्रत्ययान्तेभ्यो ढक्। वैनतेयः।

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

१०२०- स्त्रीभ्यो ढक्। स्त्रीभ्यः पञ्चम्यन्तं, ढक् प्रथमान्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। तस्यापत्यम् की

अनुवृत्ति आती है। प्रत्ययः, परश्च, ङ्याप्प्रातिपदिकात्, तद्धिताः, समर्थानां प्रथमाद्वा का अधिकार भी है।

अपत्य अर्थ में स्त्रीप्रत्ययान्त शब्दों से ढक् प्रत्यय होता है।

ढक् में ककार की हलन्त्यम् से इत्संज्ञा होती है। कित् होने के कारण किति च से आदिवृद्धि होगी। ढकार की चुटू से इत्संज्ञा प्राप्त होती है किन्तु उसे बाधकर आयनेयीनीयियः फढखछघां प्रत्ययादीनाम् उसके स्थान पर एय् आदेश का विधान होता है। ढ में केवल ढ् के स्थान पर ही एय् होगा। ढ का अकार बचा हुआ है।

वैनतेयः। विनता की सन्तान। विनतायाः अपत्यं पुमान् लौकिक विग्रह है। विनता ङस् यह षष्ठ्यन्त समर्थ प्रातिपदिक और अलौकिक विग्रह है। स्त्रीभ्यो ढक् से ढक् प्रत्यय हुआ, ककार की इत्संज्ञा हुई और ढकार के स्थान पर आयनेयीनीयियः फढखछघां प्रत्ययादीनाम् से एय् आदेश हुआ। ढ में केवल ढ् के स्थान पर ही एय् हुआ, एय्+अ=एय, विनता+ङस्+एय बना। प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् हुआ, विनता+एय बना। कित् होने के कारण किति च से आदिवृद्धि करने पर वकारोत्तरवर्ती इकार के स्थान पर ऐकार आदेश और भसंज्ञक आकार का यस्येति च से लोप करने पर वैनत्+एय बना, वर्णसम्मेलन हुआ- वैनतेय बना। एकदेशविकृतन्यायेन प्रातिपदिक मानकर सु, रुत्वविसर्ग करके वैनतेयः सिद्ध हुआ। इसके अन्य उदाहरण-

कौन्तेयः। कुन्ती की सन्तान। कुन्त्याः अपत्यं पुमान् लौकिक विग्रह और कुन्ती ङस् अलौकिक विग्रह में स्त्रीभ्यो ढक् से ढक्, आयनेयीनीयियः फढखछघां प्रत्ययादीनाम् से एय् आदेश, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् हुआ, कुन्ती+एय बना। कित् होने के कारण किति च से आदिवृद्धि करने पर ककारोत्तरवर्ती उकार के स्थान पर औकार आदेश और भसंज्ञक ईकार का यस्येति च से लोप करने पर कौन्त्+एय बना, वर्णसम्मेलन हुआ- कौन्तेय बना। एकदेशविकृतन्यायेन प्रातिपदिक मानकर सु, रुत्वविसर्ग करके कौन्तेयः सिद्ध हुआ।

राधेयः। राधा की सन्तान। राधायाः अपत्यं पुमान् लौकिक विग्रह और राधा ङस् अलौकिक विग्रह में स्त्रीभ्यो ढक् से ढक्, आयनेयीनीयियः फढखछघां प्रत्ययादीनाम् से एय् आदेश, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् हुआ, राधा+एय बना। कित् होने के कारण किति च से आदिवृद्धि करने पर रकारोत्तरवर्ती आकार के स्थान पर आकार ही आदेश और भसंज्ञक आकार का यस्येति च से लोप करने पर राध्+एय बना, वर्णसम्मेलन हुआ- राधेय बना। एकदेशविकृतन्यायेन प्रातिपदिक मानकर सु, रुत्वविसर्ग करके राधेयः सिद्ध हुआ।