Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 45
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VṛttiGovind
LSK 1019
अण्-प्रत्ययोदादेशविधायकं विधिसूत्रम्
मातुरुत् संख्यासम्भद्रपूर्वायाः
Aṣṭādhyāyī 4.1.115
Vṛtti Varadarājācārya

सङ्ख्यादिपूर्वस्य मातृशब्दस्योदादेशः स्यादण् प्रत्ययश्च।

द्वैमातुरः। षाण्मातुरः। सांमातुरः। भाद्रमातुरः।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

१०११- मातुरुत्सङ्ख्यासम्भद्रपूर्वायाः। सङ्ख्या च सम् च भद्रश्च तेषामितरेतरयोगद्वन्द्वः सङ्ख्यासम्भद्राः। सङ्ख्यासम्भद्राः पूर्वे यस्याः सा सङ्ख्यासम्भद्रपूर्वा, तस्याः, द्वन्द्वगर्भबहुव्रीहिसमासः। मातुः षष्ठ्यन्तम्, उत् प्रथमान्तं, सङ्ख्यासम्भद्रपूर्वायाः षष्ठ्यन्तं, त्रिपदं सूत्रम्। शिवादिभ्योऽण्

से अण् तथा तस्यापत्यम् की अनुवृत्ति आती है। प्रत्ययः, परश्च, ङ्याप्प्रातिपदिकात्, तद्धिताः, समर्थानां प्रथमाद्वा का अधिकार भी है।

सङ्ख्यापूर्व, सम्पूर्व तथा भद्रपूर्व मातृशब्द को अपत्य अर्थ में ह्रस्व उकार अन्तादेश होता है और इससे परे तद्धितसंज्ञक अण् प्रत्यय भी होता है।

अन्तादेश होने के कारण मातृ-शब्द के ऋकार के स्थान पर उकार आदेश प्राप्त होता है। अतः उरण् रपरः के द्वारा रपर होकर उर् हो जाता है। यह सूत्र उर् आदेश के लिए ही बना गया है, अण् प्रत्यय तो तस्यापत्यम् से सिद्ध था।

द्वैमातुरः। दो माताओं की सन्तान। द्वयोर्मात्रोरपत्यम् यह लौकिक विग्रह और द्वि ओस् मातृ ओस् अलौकिक विग्रह में अपत्यार्थक प्रत्यय की विवक्षा में तद्धितार्थोत्तरपदसमाहारे च से समास करके प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके द्विमातृ बना। मातुरुत्सङ्ख्यासम्भद्रपूर्वायाः से अण् प्रत्यय और मातृ के ऋकार के स्थान पर उकार आदेश, रपर, तद्धितेष्वचामादेः से द्वि के इकार की वृद्धि करके द्वैमातुर+अ=द्वैमातुर बना। स्वादिकार्य करके द्वैमातुरः सिद्ध हुआ।

षाण्मातुरः। छ माताओं की सन्तान। षण्णां मातृणामपत्यम् यह लौकिक विग्रह और षष् आम् मातृ आम् अलौकिक विग्रह में अपत्यार्थक प्रत्यय की विवक्षा में तद्धितार्थोत्तरपदसमाहारे च से समास करके प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके षष् मातृ बना। अन्तर्वर्तिनी विभक्ति मान कर के पदत्व के कारण पकार के स्थान पर झलां जशोऽन्ते से जश्त्व होकर डकार, उसको यरोऽनुनासिकेऽनुनासिको वा से अनुनासिक आदेश होकर णकार हुआ षण्मातृ बना। मातुरुत्सङ्ख्यासम्भद्रपूर्वायाः से अण् प्रत्यय और मातृ के ऋकार के स्थान पर उकार आदेश, रपर, तद्धितेष्वचामादेः से षष् के अकार की वृद्धि करके षाण्मातुर+अ=षाण्मातुर बना। स्वादिकार्य करके षाण्मातुरः सिद्ध हुआ।

साम्मातुरः। अच्छी माता की सन्तान। सम्मातुरपत्यं पुमान् यह लौकिक विग्रह और सम् मातृ सु अलौकिक विग्रह में कुगतिप्रादयः से समास करके प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके सम् मातृ बना। मातुरुत्सङ्ख्यासम्भद्रपूर्वायाः से अण् प्रत्यय और मातृ के ऋकार के स्थान पर उकार आदेश, रपर, तद्धितेष्वचामादेः से सम् के अकार की वृद्धि करके साम्मातुर+अ=साम्मातुर बना। स्वादिकार्य करके साम्मातुरः सिद्ध हुआ।

भाद्रमातुरः। भली माता की सन्तान। भद्रमातुरपत्यं पुमान् यह लौकिक विग्रह और भद्रा सु मातृ सु अलौकिक विग्रह में विशेषणं विशेष्येण बहुलम् समास करके प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके भद्रा माता बना। पुंवत्कर्मधारयजातीयदेशीयेषु से भद्रा को पुंवद्भाव होकर भद्रमातृ बना। मातुरुत्सङ्ख्यासम्भद्रपूर्वायाः से अण् प्रत्यय और मातृ के ऋकार के स्थान पर उकार आदेश, रपर, तद्धितेष्वचामादेः से भद्र के आदि अकार की वृद्धि करके भाद्रमातुर+अ=भाद्रमातुर बना। स्वादिकार्य करके भाद्रमातुरः सिद्ध हुआ।