Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 45
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VṛttiGovind
LSK 1018
अण्-प्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
ऋष्यन्धकवृष्णिकुरुभ्यश्च
Aṣṭādhyāyī 4.1.114
Vṛtti Varadarājācārya

ऋषिभ्यः- वासिष्ठः। वैश्वामित्रः। अन्धकेभ्यः- श्वाफल्कः।

वृष्णिभ्यः- वासुदेवः। कुरुभ्यः- नाकुलः। साहदेवः।

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

१०१८- ऋष्यन्धकवृष्णिकुरुभ्यश्च। ऋषयश्च अन्धकाश्च वृष्णयश्च कुरवश्च तेषामितरेतरयोगद्वन्द्व ऋष्यन्धकवृष्णिकुरुवस्तेभ्यः। ऋष्यन्धकवृष्णिकुरुभ्यः पञ्चम्यन्तं, च अव्ययपदं, द्विपदं सूत्रम्। शिवादिभ्योऽण् से अण् की और तस्यापत्यम् पूरे सूत्र की अनुवृत्ति आती है। प्रत्ययः, परश्च, इत्याप्रातिपदिकात्, तद्धिताः, समर्थानां प्रथमाद् वा का अधिकार आ रहा है।

ऋषिवाचकों तथा अन्धक, वृष्णि, कुरु इन तीनों वंशों में उत्पन्न व्यक्ति के वाचक शब्दों से अपत्य अर्थ में तद्धितसंज्ञक अण् प्रत्यय होता है।

यह अत इञ् का अपवाद है। अण् णित् है, अतः इसके परे रहते आदिवृद्धि होगी।

ऋषिवाचक शब्दों के उदाहरण-

वासिष्ठः। वसिष्ठ की सन्तान। वसिष्ठस्यापत्यं पुमान् लौकिक विग्रह है। वसिष्ठ इन्स् यह षष्ठ्यन्त समर्थ प्रातिपदिक और अलौकिक विग्रह है। अत इञ् से इञ् प्राप्त था, उसे बाध कर के ऋष्यन्धकवृष्णिकुरुभ्यश्च से अण् प्रत्यय हुआ- वसिष्ठ इन्स् अण् बना। णकार की इत्संज्ञा हुई- वसिष्ठ इन्स् अ बना। प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक्

हुआ, वसिष्ठ+अ बना। णित् होने के कारण तद्धितेष्वचामादेः से आदिवृद्धि करने पर वकारोत्तरवर्ती अकार के स्थान पर आकार आदेश और भसंज्ञक अकार का यस्येति च से लोप करने पर वासिष्ठ+अ बना, वर्णसम्मेलन हुआ- वासिष्ठ बना। एकदेशविकृतन्यायेन प्रातिपदिक मानकर सु, रुत्वविसर्ग करके वासिष्ठः सिद्ध हुआ। इसी तरह विश्वामित्रस्यापत्यम् विग्रह करके विश्वामित्र से अण् होकर वैश्वामित्रः बनता है।

अन्धकर्वेशियों के उदाहरण-

श्वाफल्कः। श्वफल्क की सन्तान। श्वफल्क अन्धकर्वेशी है। श्वफल्कस्यापत्यं पुमान् लौकिक विग्रह है। श्वफल्क डस् यह षष्ठ्यन्त समर्थ प्रातिपदिक और अलौकिक विग्रह है। अत इञ् से इञ् प्राप्त था, उसे बाध कर के ऋष्यन्धकवृष्णिकुरुभ्यश्च से अण् प्रत्यय, अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके श्वफल्क+अ बना। णित् होने के कारण आदिवृद्धि करने पर वकारोत्तरवर्ती अकार के स्थान पर आकार आदेश और भसंज्ञक अकार का यस्येति च से लोप करने पर श्वाफल्क+अ बना, वर्णसम्मेलन हुआ- श्वाफल्क बना। एकदेशविकृतन्यायेन प्रातिपदिक मानकर सु, रुत्वविसर्ग करके श्वाफल्कः सिद्ध हुआ।

वृष्णिवंशवाची शब्दों के उदाहरण-

वासुदेवः। वसुदेव की सन्तान, श्रीकृष्ण। वसुदेवस्यापत्यं पुमान् लौकिक विग्रह है। वसुदेव डस् यह षष्ठ्यन्त समर्थ प्रातिपदिक और अलौकिक विग्रह है। अत इञ् से इञ् प्राप्त था, उसे बाध कर के ऋष्यन्धकवृष्णिकुरुभ्यश्च से अण् प्रत्यय अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके वसुदेव+अ बना। णित् होने के कारण आदिवृद्धि करने पर वकारोत्तरवर्ती अकार के स्थान पर आकार आदेश और भसंज्ञक अकार का यस्येति च से लोप करने पर वासुदेव+अ बना, वर्णसम्मेलन हुआ- वासुदेव बना। एकदेशविकृतन्यायेन प्रातिपदिक मानकर सु, रुत्वविसर्ग करके वासुदेवः सिद्ध हुआ।

कुरुवंशवाची शब्दों के उदाहरण-

नाकुलः। नकुल की सन्तान। नकुलस्यापत्यं पुमान् लौकिक विग्रह है। नकुल डस् यह षष्ठ्यन्त समर्थ प्रातिपदिक और अलौकिक विग्रह है। अत इञ् से इञ् प्राप्त था, उसे बाध कर के ऋष्यन्धकवृष्णिकुरुभ्यश्च से अण् प्रत्यय अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके नकुल+अ बना। णित् होने के कारण आदिवृद्धि करने पर नकारोत्तरवर्ती अकार के स्थान पर आकार आदेश और भसंज्ञक अकार का यस्येति च से लोप करने पर नाकुल+अ बना, वर्णसम्मेलन हुआ- नाकुल बना। एकदेशविकृतन्यायेन प्रातिपदिक मानकर सु, रुत्वविसर्ग करके नाकुलः सिद्ध हुआ।