अपत्ये। शैवः। गाङ्गः।
१०१७- शिवादिभ्योऽण्। शिव आदिर्येषां ते शिवादयस्तेभ्यः। शिवादिभ्यः पञ्चम्यन्तम्, अण्
प्रथमान्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। तस्यापत्यम् पूरे सूत्र की अनुवृत्ति आती है। प्रत्ययः, परश्च, इत्याप्रातिपदिकात्, तद्धिताः, समर्थानां प्रथमाद् वा का अधिकार आ ही रहा है।
अपत्यार्थ में शिवादिगण पठित शब्दों से तद्धितसंज्ञक अण् प्रत्यय होता है।
णकार इत्संज्ञक है और अ ही शेष रहता है। णित् होने से णित् मानकर होने वाले वृद्धि आदि कार्य होंगे।
शैवः। शिव की सन्तान। शिवस्य अपत्यं पुमान् लौकिक विग्रह है। शिव इन्स् यह षष्ठ्यन्त समर्थ प्रातिपदिक और अलौकिक विग्रह है। शिवादिभ्योऽण् से अण् प्रत्यय हुआ- शिव इन्स् अण् बना। णकार की इत्संज्ञा हुई- शिव इन्स् अ बना। प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् हुआ, शिव+अ बना। णित् होने के कारण तद्धितेष्वचामादेः से आदिवृद्धि करने पर शकारोत्तरवर्ती इकार के स्थान पर ऐकार आदेश और भसंज्ञक अकार का यस्येति च से लोप करने पर शैव+अ बना, वर्णसम्मेलन हुआ- शैव बना। एकदेशविकृतन्यायेन प्रातिपदिक मानकर सु, रुत्वविसर्ग करके शैवः सिद्ध हुआ।
गाङ्गः। गङ्गा की सन्तान, भीष्म आदि। गङ्गायाः अपत्यं पुमान् लौकिक विग्रह है। गङ्गा इन्स् यह षष्ठ्यन्त समर्थ प्रातिपदिक और अलौकिक विग्रह है। शिवादिभ्योऽण् से अण् प्रत्यय हुआ- गङ्गा इन्स् अण् बना। णकार की इत्संज्ञा हुई- गङ्गा इन्स् अ बना। प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् हुआ, गङ्गा+अ बना। णित् होने के कारण तद्धितेष्वचामादेः से आदिवृद्धि करने पर गकारोत्तरवर्ती अकार के स्थान पर आकार आदेश और भसंज्ञक आकार का यस्येति च से लोप करने पर गाङ्ग्+अ बना, वर्णसम्मेलन हुआ- गाङ्ग बना। एकदेशविकृतन्यायेन प्रातिपदिक मानकर सु, रुत्वविसर्ग करके गाङ्गः सिद्ध हुआ।