Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 45
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VṛttiGovind
LSK 1016
अञ्-प्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
अनृष्यानन्तर्ये बिदादिभ्योऽञ्
Aṣṭādhyāyī 4.1.104
Vṛtti Varadarājācārya

एभ्योऽञ् गोत्रे। ये त्वत्रानृषयस्तेभ्योऽपत्येऽन्यत्र तु गोत्रे।

बिदस्य गोत्रं बैदः। बैदौ। बिदाः। पुत्रस्यापत्यं पौत्रः। पौत्रौ। पौत्राः।

एवं दौहित्रादयः।

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

१०१६- अनृष्यानन्तर्ये बिदादिभ्योऽञ्। न ऋषिः अनृषिः। अनन्तरमेव आनन्तर्य, तस्मिन् बिद आदिर्येषां ते बिदादयस्तेभ्यः। अनृषि लुप्तपञ्चमीकं पदम्, आनन्तर्ये सप्तम्यन्तं, बिदादिभ्यः पञ्चम्यन्तम्, अञ् प्रथमान्तम्, अनेकपदं सूत्रम्। गोत्रे कुञ्जादिभ्यश्चक्रञ् से गोत्रे की और तस्यापत्यम् पूरे सूत्र की अनुवृत्ति आती है। प्रत्ययः, परश्च, ड्याप्य्रातिपदिकात्, तद्धिताः, समर्थानां प्रथमाद् वा का अधिकार आ ही रहा है।

बिदादिगणपठित शब्दों से गोत्रापत्य अर्थ में तद्धितसंज्ञक अञ् प्रत्यय होता है परन्तु इनमें जो शब्द ऋषिवाचक नहीं हैं, उनसे अनन्तरापत्य अर्थ में ही हो।

दूसरी पीढ़ी अनन्तरापत्य होती है। बिदादि एक गण है। इसमे कुछ ऋषियों के नाम और कुछ पुत्र, दुहितृ आदि ऐसे प्रातिपदिक भी पढ़े गये हैं जो ऋषिवाचक नहीं हैं। इस सूत्र से बिदादिगण में पढ़े गये ऋषिवाचक शब्दों से गोत्रापत्य अर्थ में और अनृषिवाचक शब्दों से अनन्तरापत्य अर्थ में प्रत्यय का विधान किया जाता है।

बैदः। बिद नामक ऋषि की पौत्र आदि सन्तान। बिदस्य गोत्रापत्यं पुमान् लौकिक विग्रह है। बिद डस् यह षष्ठ्यन्त समर्थ प्रातिपदिक और अलौकिक विग्रह है। अनृष्यानन्तर्ये बिदादिभ्योऽञ् से अञ् प्रत्यय हुआ- बिद डस् अञ् बना। जकार की इत्संज्ञा हुई- बिद डस् अ बना। प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् हुआ, बिद+अ बना। जित् होने के कारण तद्धितेष्वचामादेः से आदिवृद्धि करने पर पकारोत्तरवर्ती उकार के स्थान पर ऐकार आदेश और भसंज्ञक अकार का यस्येति च से लोप करने पर बैद+अ बना, वर्णसम्मेलन हुआ- बैद बना। एकदेशविकृतन्यायेन प्रातिपदिक मानकर सु, रुत्वविसर्ग करके बैदः सिद्ध हुआ। द्विवचन में बैदौ बनता है। बहुवचन की विवक्षा में यजओश्च से अञ् का लुक् होता है। अतः वृद्धि भी नहीं हो सकेगी। जिससे बिदाः ऐसा रूप बन जाता है। यह तो ऋषिवाचक शब्दों का उदाहरण है। अनृषिवाचक पुत्र आदि शब्दों के अनन्तरापत्य में उदाहरण नीचे देखें।

बैत्रः। पुत्र की सन्तान पोता आदि। पुत्रस्यानन्तरापत्यं पुमान् लौकिक विग्रह है। पुत्र डस् यह षष्ठ्यन्त समर्थ प्रातिपदिक और अलौकिक विग्रह है। अनृष्यानन्तर्ये बिदादिभ्योऽञ् से अनन्तरापत्य अर्थ में अञ् प्रत्यय हुआ- पुत्र डस् अञ् बना। जकार की इत्संज्ञा हुई- पुत्र डस् अ बना। प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् हुआ, पुत्र+अ बना। जित् होने के कारण तद्धितेष्वचामादेः से आदिवृद्धि करने पर पकारोत्तरवर्ती उकार के स्थान पर औकार आदेश और भसंज्ञक अकार का यस्येति च से लोप करने पर पौत्र+अ बना, वर्णसम्मेलन हुआ- पौत्र बना। एकदेशविकृतन्यायेन प्रातिपदिक मानकर सु, रुत्वविसर्ग करके पौत्रः सिद्ध हुआ। पौत्रः, पौत्रौ, पौत्राः आदि। इसी तरह दुहितुरनन्तरापत्यं पुमान् लड़की की सन्तान आदि दौहित्रः, दौहित्रौ, दौहित्राः आदि बनाया जाता है। दुहितृ+अ में इको यणचि से यण् करना न भूलें।