Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 45
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VṛttiGovind
LSK 1015
इज्-प्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
बाह्वादिभ्यश्च
Aṣṭādhyāyī 4.1.96
Vṛtti Varadarājācārya

बाहविः। औडुलोमिः।

वार्तिकम्- लोम्नोऽपत्येषु बहुष्वकारो वक्तव्यः। उडुलोमाः। आकृतिगणोऽयम्।

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

१०१५- बाह्वादिभ्यश्च। बाहुः आदिर्येषां ते बाह्वादयस्तेभ्यो बाह्वादिभ्यः। बाह्वादिभ्यः पञ्चम्यन्तं, च अव्ययपदं, द्विपदं सूत्रम्। तस्यापत्यम् इस पूरे सूत्र की तथा अत इञ् से इञ् की अनुवृत्ति आती है। प्रत्यय, परश्च उच्याप्रातिपदिकात्, तद्धिताः, समर्थानां प्रथमाद् वा का अधिकार आ रहा है। बाहु आदि गणपठित शब्दों से अपत्य अर्थ में अपत्य अर्थ में इञ् प्रत्यय होता है।

. बाहविः। बाहु नामक व्यक्ति की सन्तान। बाहोः अपत्यं पुमान् लौकिक विग्रह है। बाहु इन्स् यह षष्ठ्यन्त समर्थ प्रातिपदिक और अलौकिक विग्रह है। बाह्वादिभ्यश्च से इञ् प्रत्यय हुआ- बाहु इन्स् इञ् बना। जकार की इत्संज्ञा हुई- बाहु इन्स् इ बना। प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् हुआ, बाहु+इ बना। जित् होने के कारण तद्धितेष्वचामादेः से आदिवृद्धि करने पर बकारोत्तरवर्ती आकार के स्थान पर आकार ही आदेश हुआ। ओर्गुणः से बाहु के उकार को गुण करके अव् आदेश करने पर बाहवि बना। एकदेशविकृतन्यायेन प्रातिपदिक मानकर सु, रुत्वविसर्ग करके बाहविः सिद्ध हुआ।

लोम्नोऽपत्येषु बहुष्वकारो वक्तव्यः। यह वार्तिक है। अपत्य अर्थ में लोमन् शब्द से बहुवचन में अकार प्रत्यय होता है। यह बाह्वादिभ्यश्च का अपवाद है।

औडुलोमिः। उडुलोमन् नामक व्यक्ति की सन्तान। उडुलोम्नः अपत्यं पुमान् लौकिक विग्रह है। उडुलोमन् इन्स् यह षष्ठ्यन्त समर्थ प्रातिपदिक और अलौकिक विग्रह है। बाह्वादिभ्यश्च से इञ् प्रत्यय हुआ- उडुलोमन् इन्स् इञ् बना। जकार की इत्संज्ञा हुई- उडुलोमन् इन्स् इ बना। प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् हुआ, उडुलोमन्+इ बना। जित् होने के कारण तद्धितेष्वचामादेः से आदिवृद्धि करने पर उकार के स्थान पर औकार आदेश हुआ। औडुलोमन्+इ बना। नस्तद्धिते से टिसंज्ञक अन् का लोप हुआ- औडुलोम्+इ बना। वर्णसम्मेलन होने पर औडुलोमि बना। एकदेशविकृतन्यायेन प्रातिपदिक मानकर सु, रुत्वविसर्ग करके औडुलोमिः सिद्ध हुआ। बहुवचन में बाह्वादिभ्यश्च को बाधकर लोम्नोऽपत्येषु बहुष्वकारो वक्तव्यः इस वार्तिक से अ-प्रत्यय होकर उडुलोमाः बनेगा। अन्तर इतना है कि इञ् होने पर जित् होने के कारण वृद्धि होती है और अ होने पर वृद्धि नहीं होती। अतः उडुलोमाः ही बनता है। यह शब्द बहुवचन में अकारान्त और अन्यत्र इकारान्त होता है। इस, तरह इसके रूप बनते हैं- औडुलोमिः, औडुलोमी, उडुलोमाः। औडुलोमिम्, औडुलोमी, उडुलोमान्। औडुलोमिना, औडुलोमिभ्याम्, उडुलोमैः इत्यादि।