अपत्येऽर्थे। दाक्षिः।
१०१४- अत इज्। अतः पञ्चम्यन्तम्, इज् प्रथमान्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। प्रत्यय, परश्च ङ्याप्प्रातिपदिकात्, तद्धिताः, समर्थानां प्रथमाद् वा का अधिकार आ रहा है और तस्यापत्यम् इस पूरे सूत्र की अनुवृत्ति आ रही है।
अपत्य अर्थ में ह्रस्व अकारान्त षष्ठ्यन्त समर्थ प्रातिपदिक से इज् प्रत्यय होता है।
जकार इत्संज्ञक है, इकार ही शेष रहता है। जित् होने से जित्व-प्रयुक्त वृद्धि आदि कार्य होते हैं।
दाक्षिः। दक्ष की सन्तान। दक्षस्य अपत्यं पुमान् लौकिक विग्रह है। दक्ष ङस् यह षष्ठ्यन्त समर्थ प्रातिपदिक और अलौकिक विग्रह है। अत इज् से इज् प्रत्यय हुआ- दक्ष ङस् इज् बना। जकार की इत्संज्ञा हुई- दक्ष ङस् इ बना। प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् हुआ, दक्ष+इ बना। जित् होने के कारण तद्धितेष्वचामादेः से आदिवृद्धि करने पर दकारोत्तरवर्ती अकार के स्थान पर आकार आदेश और भसंज्ञक अकार का यस्येति च से लोप करने पर दाक्ष+इ बना, वर्णसम्मेलन हुआ- दाक्षि बना। एकदेशविकृतन्यायेन प्रातिपदिक मानकर सु, रुत्वविसर्ग करके दाक्षिः सिद्ध हुआ।
इसी तरह आगे और प्रयोग भी बनते हैं।
दाशरथिः। दशरथ की सन्तान। दशरथस्य अपत्यं पुमान् लौकिक विग्रह है। दशरथ ङस् यह षष्ठ्यन्त समर्थ प्रातिपदिक और अलौकिक विग्रह है। अत इज् से इज् प्रत्यय हुआ- दशरथ ङस् इज् बना। जकार की इत्संज्ञा हुई- दशरथ ङस् इ बना। प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् हुआ, दशरथ+इ बना। जित् होने के कारण तद्धितेष्वचामादेः से आदिवृद्धि करने पर दकारोत्तरवर्ती अकार के स्थान पर आकार आदेश और भसंज्ञक
अकार का यस्येति च से लोप करने पर दाशरथ्+इ बना, वर्णसम्मेलन हुआ- दाशिरथि बना। एकदेशविकृतन्यायेन प्रातिपदिक मानकर सु विभक्ति, उसका रुत्वविसर्ग करके दाशरथिः सिद्ध हुआ। इसी तरह अर्जुनस्यापत्यम् आर्जुनिः, युधिष्ठिरस्यापत्यं यौधिष्ठिरिः, कृष्णस्यापत्यं कार्ष्णिः आदि अनेक अपत्यप्रत्ययान्त शब्द बनाये जा सकते हैं।