वंश्ये पित्रादौ जीवति पौत्रादेर्यदपत्यं चतुर्थादि तद्युवसंज्ञमेव स्यात्।
१०१०- जीवति तु वंश्ये युवा। जीवति सप्तम्यन्तं, तु अव्ययपदं, वंश्ये सप्तम्यन्तं, युवा प्रथमान्तम्, अनेकपदमिदं सूत्रम्। अपत्यं पौत्रप्रभृति गोत्रम् से विभक्तिविपरिणाम करके पौत्रप्रभृतेः तथा तस्यापत्यम् से अपत्यम् की अनुवृत्ति आती है।
वंश में होने वाले पिता, पितामह आदि के जीवित रहते पौत्र आदि का अपत्य चतुर्थ आदि पीढ़ी स्थित हो, उसकी युवन्-संज्ञा अर्थात् युवा संज्ञा होती है।
यह गोत्रसंज्ञा का अपवाद है। वंश में मूलपुरुष अर्थात् जिससे हम पीढ़ियों की गणना कर रहे हैं, उसका पुत्र दूसरी पीढ़ी अपत्य मात्र, उसका पुत्र तीसरी पीढ़ी भी गोत्रापत्य, उसका भी पुत्र चौथी पीढ़ी युवापत्य हो जाता है किन्तु युवापत्य में मूलपुरुष अर्थात् प्रथम पीढ़ी का जीवित होना आवश्यक है। तात्पर्य यह हुआ कि मूलपुरुष के रहते चौथी, पाँचवीं
आदि पीढियों की युवन् संज्ञा मानी जाती है। युवसंज्ञा का फल अग्रिमसूत्र गोत्राद्यून्यस्त्रियाम् से स्पष्ट हो जायेगा।