गोत्रे यद् यजन्तमजन्तञ्च तदवयवयोरेतयोर्लुक् स्यात् तत्कृते बहुत्वे न तु स्त्रियाम्। गर्गाः। वत्साः।
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१००९- यज्ञजोश्च। यज् च अज् च तयोरितरेतरद्वन्द्वो यज्जो, तयोर्यज्जोः। यज्जोः षष्ठ्यन्तं, च अव्ययपदं, द्विपदं सूत्रम्। ण्यक्षत्रियार्षजितो यूनि लुगणिजोः से लुक् तथा यस्कादिभ्यो गोत्रे से गोत्रे एवं तद्राजस्य बहुषु तेनैवास्त्रियाम् से बहुषु तेन एव अस्त्रियाम् की अनुवृत्ति आती है।
गोत्र अर्थ में जो यजन्त और अजन्त शब्द, उनके अवयव यज् और अज्
प्रत्ययों का लुक् हो जाता है यदि उन प्रत्ययों के अर्थ का बहुत्व बताना अभीष्ट हो, परन्तु स्त्रीलिङ्ग में यह लुक् प्रवृत्त नहीं होता।
तात्पर्य यह है कि बहुवचन में गोत्रापत्य अर्थ में हुए यज् और अज् प्रत्ययों का लुक् हो जाता है परन्तु यह लुक् तभी होता है जब वह बहुवचन गोत्रापत्य के बहुत्व को ही बताता हो। किञ्च स्त्रीलिङ्ग में यह लुक् प्रवृत्त नहीं होता।
गर्गाः। गर्ग के बहुत गोत्रापत्य। गर्गस्य गोत्रापत्यानि लौकिक विग्रह हैं। गर्ग इन्स् यह षष्ठ्यन्त समर्थ प्रातिपदिक और अलौकिक विग्रह हैं। गर्गादिभ्यो यज् से यज् प्रत्यय करके- गार्ग्य बना है। इस यजन्त शब्द से प्रथमा के बहुवचन की विवक्षा में जस् प्रत्यय लाने पर यज्ञोश्च से यज् प्रत्यय का लुक् होकर निमित्तापाये नैमित्तिकस्याप्यपायः इस न्याय के अनुसार उसके आदिवृद्धि आदि कार्यों के भी निवृत्त हो जाने से शुद्ध गर्ग शब्द रह जाता है। इस तरह गर्ग+अस् में पूर्वसवर्णदीर्घ, सकार को रुत्वविसर्ग होकर गर्गाः सिद्ध हुआ। यह कार्य बहुवचन में ही होता है। इस तरह इसके रूप बनेंगे गार्ग्यः, गार्ग्यों, गर्गाः। गार्ग्यम्, गार्ग्यों, गर्गान्। गार्ग्येण, गार्ग्याभ्याम्, गर्गैः आदि।
वत्साः। वत्स के बहुत गोत्रापत्य। वत्सस्य गोत्रापत्यानि लौकिक विग्रह हैं। वत्स इन्स् यह षष्ठ्यन्त समर्थ प्रातिपदिक और अलौकिक विग्रह हैं। गर्गादिभ्यो यज् से यज् प्रत्यय करके- वात्स्य बना है। इस यजन्त शब्द से प्रथमा के बहुवचन की विवक्षा में जस् प्रत्यय लाने पर यज्ञोश्च से यज् प्रत्यय का लुक् होकर निमित्तापाये नैमित्तिकस्याप्यपायः इस न्याय के अनुसार उसके आदिवृद्धि आदि कार्यों के भी निवृत्त हो जाने से शुद्ध वत्स-शब्द रह जाता है। इस तरह वत्स+अस् में पूर्वसवर्णदीर्घ, सकार को रुत्वविसर्ग होकर वत्साः सिद्ध हुआ। यह कार्य बहुवचन में ही होता है। इस तरह इसके रूप बनेंगे वात्स्यः, वात्स्यौ, वत्साः। वात्स्यम्, वात्स्यौ, वत्सान्। वात्स्येन, वात्स्याभ्याम्, वत्सैः आदि।