Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 45
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VṛttiGovind
LSK 1008
यज्-प्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
गर्गादिभ्यो यञ्
Aṣṭādhyāyī 4.1.105
Vṛtti Varadarājācārya

गोत्रापत्ये। गर्गस्य गोत्रापत्यं गार्ग्यः। वात्स्यः।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

१००८- गर्गादिभ्यो यज्। गर्गादिभ्यः पञ्चम्यन्तं, यज् प्रथमान्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। पदविधि होने के कारण समर्थः पदविधिः से समर्थः का लाभ है। प्रत्यय, परश्च उच्याप्रातिपदिकात्, तद्धिताः, समर्थानां प्रथमाद्वा का अधिकार आ रहा है।

गर्ग आदि गणपठित शब्दों से गोत्रापत्य अर्थ में यज्-प्रत्यय होता है।

यज् में जकार इत्संज्ञक है, य शेष रह जाता है। जित् होने के कारण तद्धितेष्वचामादेः की वृद्धि होती है।

गार्ग्यः। गर्ग का गोत्रापत्य अर्थात् पौत्र आदि सन्तान। गर्गस्य गोत्रापत्यं पुमान् लौकिक विग्रह है। गर्ग इन्स् यह षष्ठ्यन्त समर्थ प्रातिपदिक और अलौकिक विग्रह है। गर्गादिभ्यो यज् से यज् प्रत्यय, गर्ग इन्स् यज् बना। जकार की इत्संज्ञा, गर्ग इन्स् य बना। प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् हुआ, गर्ग+य बना। तद्धितेष्वचामादेः से आदिवृद्धि करने पर गकारोत्तरवर्ती अकार के स्थान पर आकार आदेश और भसंज्ञक अकार का यस्येति च से लोप करने पर गार्ग्+य बना, वर्णसम्मेलन हुआ- गार्ग्य बना। एकदेशविकृतन्यायेन प्रातिपदिक मानकर सु, रुत्वविसर्ग करके गार्ग्यः सिद्ध हुआ।

वात्स्यः। वत्स का गोत्रापत्य अर्थात् पौत्र आदि सन्तान। वत्सस्य गोत्रापत्यं पुमान् लौकिक विग्रह है। वत्स इन्स् यह षष्ठ्यन्त समर्थ प्रातिपदिक और अलौकिक विग्रह है। गर्गादिभ्यो यज् से यज् प्रत्यय हुआ- वत्स इन्स् यज् बना। जकार की इत्संज्ञा हुई वत्स इन्स् य बना। प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् हुआ, वत्स+य बना। तद्धितेष्वचामादेः से आदिवृद्धि करने पर वकारोत्तरवर्ती अकार के स्थान पर आकार आदेश और भसंज्ञक अकार का यस्येति च से लोप करने पर वात्स्+य बना, वर्णसम्मेलन हुआ- वात्स्य बना। एकदेशविकृतन्यायेन प्रातिपदिक मानकर सु, रुत्वविसर्ग करके वात्स्यः सिद्ध हुआ।