गोत्रे एक एवापत्यप्रत्ययः स्यात्। उपगोर्गोत्रापत्यमौपगवः।
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१००७- एको गोत्रे। एकः प्रथमान्तं, गोत्रे सप्तम्यन्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्।
गोत्र अर्थ में एक ही अपत्य-प्रत्यय होता है।
इस सूत्र से यह निकलता है- जिस प्रकार से उपगोर्गोत्रापत्यम् विग्रह करने पर उपगु से गोत्रापत्य(पौत्र) अर्थ में अण् प्रत्यय होकर औपगवः बनता है, उसी प्रकार चौथी पीढ़ी वाले या पाँचवीं पीढ़ी वाले को कहना हो तो भी उपगु से ही अण् प्रत्यय होकर औपगवः ही रूप बनेगा, न कि औपगव बनने के बाद फिर दूसरी, तीसरी बार कोई प्रत्यय आयेगा। कहने का तात्पर्य यह है कि एक ही अण् प्रत्यय से उस परम्परा में आयी हुई किसी भी पीढ़ी के पुरुष का बोध हो जायेगा। अतः उसके लिए बार-बार प्रत्यय करने की जरूरत होती नहीं है।
तात्पर्य यह है कि उपगोरपत्यम् औपगवः, तस्य औपगवस्यापि अपत्यम् औपगवः, तस्यापि अपत्यम् औपगवः इत्यादि। इस प्रकार से एक ही अपत्य प्रत्यय अण् आदि प्रत्यय होता है जो मूलपुरुष से किया जाता है और सब पीढ़ियों का बोध होता है, चाहे तीसरी, चौथी, पाँचवीं छठी पीढ़ियाँ क्यों न हों। इस तरह यह सूत्र एक नियम बनाता है। अर्थात् उपगु की सन्तान औपगव, औपगव की सन्तान, उनकी भी सन्तान औपगव ही होती है। गोत्र अर्थ में प्रत्यय करने पर तस्य गोत्रापत्यम् ऐसा विग्रह किया जायेगा।
औपगवः। उपगु नामक व्यक्ति का पोता सन्तान। उपगोर्गोत्रापत्यं पुमान् लौकिक विग्रह है। उपगु इन् यह षष्ठ्यन्त समर्थ प्रातिपदिक है अलौकिक विग्रह है। एको गोत्रे के नियमानुसार तस्यापत्यम् से ही गोत्र-अपत्य अर्थ में अण् प्रत्यय हुआ- उपगु इन् अण् बना। णकार की इत्संज्ञा हुई उपगु इन् अ बना। प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक हुआ, उपगु+अ बना। तद्धितेष्वचामादेः से आदिवृद्धि करने पर उ के स्थान पर औकार आदेश
ओर्गुणः से अन्त्य अच् उकार को गुण करने पर ओकार होकर औपगो+अ बना। ओकार के स्थान पर अव् आदेश होकर औपग्+अव्+अ बना, वर्णसम्मेलन हुआ- औपगव बना। एकदेशविकृतन्यायेन प्रातिपदिक मानकर सु, रुत्वविसर्ग करके औपगवः सिद्ध हुआ।