Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 45
Show
VṛttiGovind
LSK 1006
गोत्रसंज्ञाविधायकं संज्ञासूत्रम्
अपत्यं पौत्रप्रभृति गोत्रम्
Aṣṭādhyāyī 4.1.162
Vṛtti Varadarājācārya

अपत्यत्वेन विवक्षितं पौत्रादि गोत्रसंज्ञं स्यात्।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

१००६- अपत्यं पौत्रप्रभृति गोत्रम्। पौत्रः प्रभृतिर्यस्य तत् पौत्रप्रभृति। अपत्यं प्रथमान्तं, पौत्रप्रभृति प्रथमान्तं, गोत्रं प्रथमान्तं, त्रिपदमिदं सूत्रम्।

जब पौत्र ( पुत्र के पुत्र ) को अपत्य अर्थात् सन्तान के रूप में कहना अभीष्ट हो तो उसकी गोत्रसंज्ञा होती है।

तात्पर्य यह है कि जब पौत्र, प्रपौत्र आदि पीढ़ियों को अपत्य अर्थात् सन्तान के रूप में कहने की अपेक्षा हो तो उनकी गोत्रसंज्ञा की जाती है। इस तरह पौत्र आदि गोत्रापत्य हो जाते हैं और गोत्रापत्य अर्थ में आगे प्रत्यय आदि हो जायेंगे। पुत्र की गोत्रसंज्ञा नहीं होती है।