Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 45
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VṛttiGovind
LSK 1005
गुणविधायकं विधिसूत्रम्
ओर्गुणः
Aṣṭādhyāyī 6.4.146
Vṛtti Varadarājācārya

उवर्णान्तस्य भस्य गुणस्तद्धिते।

उपगोरपत्यम् औपगवः। आश्वपतः। दैत्यः। औत्सः। स्त्रैणः। पौंस्नः।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

१००५- ओर्गुणः। ओः षष्ठ्यन्तं, गुणः प्रथमान्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। इस सूत्र में नस्तद्धिते से तद्धिते की अनुवृत्ति आती है।

तद्धित प्रत्यय के परे होने पर भसंज्ञक उवर्णान्त को गुण होता है।

भसंज्ञा अजादि या यकारादि प्रत्यय के परे रहते पूर्व की होती है, अतः यह मान लेना चाहिए कि अजादि या यकारादि के परे रहने पर ही यह सूत्र लगता है।

औपगवः। उपगु नामक व्यक्ति की सन्तान। उपगोः अपत्यं पुमान् लौकिक विग्रह है। उपगु इस् यह षष्ठ्यन्त समर्थ प्रातिपदिक वाला अलौकिक विग्रह है। तस्यापत्यम् से अण् प्रत्यय हुआ- उपगु इस् अण् बना। णकार की इत्संज्ञा हुई उपगु इस् अ बना। प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् हुआ, उपगु+अ बना। तद्धितेष्वचामादेः से आदिवृद्धि करने पर उ के स्थान पर औकार आदेश होकर ओर्गुणः से अन्त्य अच् उकार को गुण करने पर ओकार होकर औपगो+अ बना। ओकार के स्थान पर अव् आदेश होकर औपग्+अव्+अ बना, वर्णसम्मेलन हुआ- औपगव बना। एकदेशविकृतन्यायेन प्रातिपदिक मानकर सु, रुत्वविसर्ग करके औपगवः सिद्ध हुआ।

आश्वपतः। अश्वपति की सन्तान। अश्वपतेः अपत्यं पुमान् लौकिक विग्रह है। अश्वपति इस् यह षष्ठ्यन्त समर्थ प्रातिपदिक अलौकिक विग्रह है। तस्यापत्यम् के अर्थ में अश्वपत्यादिभ्यश्च से अण् प्रत्यय हुआ- अश्वपति इस् अण् बना। णकार की इत्संज्ञा हुई अश्वपति इस् अ बना। प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् हुआ, अश्वपति+अ बना। तद्धितेष्वचामादेः से आदिवृद्धि करने पर अकार के स्थान पर आकार आदेश और भसंज्ञक इकार का यस्येति च से लोप करने पर आश्वपत्+अ बना, वर्णसम्मेलन हुआ- आश्वपत बना। एकदेशविकृतन्यायेन प्रातिपदिक मानकर सु, रुत्वविसर्ग करके आश्वपतः सिद्ध हुआ। वैसे पूर्वप्रकरण में आप आश्वपतम् बना ही चुके हैं।

दैत्यः। दिति की सन्तान। दितेः अपत्यं पुमान् ऐसे अलौकिक विग्रह और दिति इस् अलौकिक विग्रह वाले षष्ठ्यन्त समर्थ प्रातिपदिक से तस्यापत्यम् के अर्थ में दित्यदित्यादित्यपत्युत्तरपदाण्यः से ण्य प्रत्यय हुआ- दिति इस् ण्य बना। णकार की इत्संज्ञा हुई दिति इस् य बना। प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् हुआ, दिति+य बना। तद्धितेष्वचामादेः से आदिवृद्धि करने पर इकार के स्थान पर ऐकार आदेश और भसंज्ञक इकार का यस्येति च से लोप करने पर दैत्+य बना, वर्णसम्मेलन हुआ- दैत्य बना। एकदेशविकृतन्यायेन प्रातिपदिक मानकर सु, रुत्वविसर्ग करके दैत्यः सिद्ध हुआ। पूर्वप्रकरण में भी आप दैत्यः बना चुके हैं। इसी प्रकार प्राजापत्यः भी बनाइये।

स्त्रैणः। स्त्री की सन्तान आदि। स्त्रिया अपत्यम् लौकिक विग्रह है। स्त्री इस् से स्त्रीपुंसाभ्यां नञ्स्नञ्जौ भवनात् के अनुसार तस्यापत्यम् से नञ् प्रत्यय, अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके स्त्री+न बना। जित् होने के कारण तद्धितेष्वचामादेः से आदिवृद्धि होने पर ईकार के स्थान पर ऐकार हो गया, स्त्रै+न बना। अद्कुष्वाङ्नुम्यवायेऽपि से प्रत्यय के नकार के स्थान पर णकार आदेश होकर स्त्रैण बना। विभक्तिकार्य करके स्त्रैणः सिद्ध हुआ।

पौंस्नः। पुरुष की सन्तान आदि। पुंसः अपत्यम् लौकिक विग्रह है। पुंस् इस् से स्त्रीपुंसाभ्यां नञ्स्नञ्जौ भवनात् के अनुसार तस्यापत्यम् से स्नञ् प्रत्यय, अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके पुंस्+स्न बना। जित् होने के कारण तद्धितेष्वचामादेः

से आदिवृद्धि होने पर उकार के स्थान पर औकार हो गया, पौंस्+स्न बना। पौंस् के सकार का विभक्ति के लुक हो जाने पर भी पूर्व विभक्ति को मान कर पदत्व होने से संयोगान्त लोप करके पौंस्न बना। विभक्तिकार्य करके पौंस्नः सिद्ध हुआ।