षष्ठ्यन्तात्कृतसन्धेः समर्थादपत्येऽर्थे उक्ता वक्ष्यमाणाश्च प्रत्यया वा स्युः।
१००४- तस्यापत्यम्। तस्य षष्ठ्यन्तम्, अपत्यं प्रथमान्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। पदविधि होने के कारण समर्थः पदविधिः से समर्थः का लाभ है। प्रत्यय, परश्च उच्चाप्यातिपदिकात्, तद्धिताः, समर्थानां प्रथमाद् वा का अधिकार आ रहा है। प्राग्दीव्यतोऽण् से अण् की अनुवृत्ति आती है।
षष्ठ्यन्त कृतसन्धिकार्य समर्थ प्रातिपदिक से अपत्य(सन्तान) अर्थ में इस सूत्र के पहले कहे गये प्रत्यय और आगे आने वाले प्रत्यय होते हैं।
विशेषः- इस तद्धितप्रकरण में कई प्रकार के सूत्र हैं। कुछ सूत्र प्रत्यय के विधान के लिए हैं तो कुछ सूत्र अर्थविशेष को बताने के लिए और कुछ सूत्र प्रकृतिविशेष को बताने के लिए।
उक्त तीनों के क्रमशः उदाहरण- दित्यदित्यादित्यपत्युत्तरपदाण्यः सूत्र दिति आदि शब्दों से ण्य प्रत्ययविशेष के विधान के लिए है तो तस्यापत्यम् अपत्य-अर्थविशेष को बताने के लिए है। इसी तरह यज्ञिजोश्च प्रकृतिविशेष को बताने के लिए।
कुछ सूत्र प्रकृति, प्रत्यय और अर्थ तीनों को भी बताते हैं- जैसे किंयत्तदोर्निर्धारणे द्वयोरेकरस्य डतरच् और कुछ सूत्र केवल प्रकृति-प्रत्यय मात्र को बताते हैं- जैसे उत्सादिभ्योऽञ्। केवल अर्थ और प्रत्यय को बताने वाले कुछ सूत्र होते हैं, जैसे- इषदसमाप्तौ कल्पब्देश्यदेशीयरः। कुछ सूत्र समर्थ सुबन्त के निर्देश के साथ-साथ अर्थविशेष को बताने के लिए भी बनाये गये है, जैसे- तस्यापत्यम्, तत्र भवः, तेन प्रोक्तम्, तत् आगतः आदि। केवल तत्तत् कार्य का ही इनसे विधान मानेंगे तो सूत्रार्थ पूर्ण नहीं होगा। इस लिए आवश्यकता के अनुसार सूत्रों की एकवाक्यता करके अर्थ करना चाहिए जिससे एक महावाक्य बनकर इष्टरूपों की सिद्धि हो सके।
यह सूत्र केवल षष्ठ्यन्त समर्थ प्रकृति और अपत्य-रूप अर्थविशेष का निर्देश करता है, प्रत्यय तो पीछे कहे गये या आगे कहे जाने वाले तत्तत् सूत्रों से होंगे। प्रत्ययविधायकसूत्र और अर्थनिर्देशकसूत्रों की आपस में एकवाक्यता होती है। तस्यापत्यम् यह अधिकारसूत्र भी है विधिसूत्र भी, अतः आगे के सूत्रों में इसका अधिकार भी जाता है या अनुवृत्ति भी मान सकते हैं।