Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 45
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VṛttiGovind
LSK 1003
नञ्सन्ञ्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
स्त्रीपुंसाभ्यां नञ्स्नञौ भवनात्
Aṣṭādhyāyī 4.1.87
Vṛtti Varadarājācārya

धान्यानां भवन इत्यतः प्रागर्थेषु स्त्रीपुंसाभ्यां क्रमान्नञ्सन्ञौ स्तः।

स्त्रैणः। पौंस्नः।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

अब तद्धितप्रकरण में अपत्याधिकारप्रकरण का प्रारम्भ होता है। इनमें प्रायः अपत्य-अर्थ में प्रत्ययों का विधान किया जायेगा। तद्धिताः, समर्थानां, प्रथमाद्, वा का अधिकार प्रत्ययविधायक सूत्रों में रहेगा ही। पहले की तरह प्रत्यय करने के बाद प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् और प्रत्ययों के परे होने वाले गुण, वृद्धि, इवर्ण-अवर्ण का लोप आदि कार्य भी होंगे। अपत्यार्थ में लौकिक विग्रह में पुँल्लिङ्ग के साथ पुमान् और स्त्रीलिङ्ग के साथ स्त्री जोड़ने का प्रचलन है, जैसे- दिते: अपत्यं पुमान्- दैत्यः एवं दिते: अपत्यं स्त्री- दैत्या आदि। स्मरण रहे कि समास की तरह तद्धित में भी अलौकिक विग्रह से ही प्रत्यय होते हैं। १००३- स्त्रीपुंसाभ्यां नञ्सन्ञौ भवनात्। स्त्री च पुमान् च तयोरितरेतरयोगद्वन्द्वः स्त्रीपुमांसौ, ताभ्याम्। नञ् च स्नञ् च तयोरितरेतरयोगद्वन्द्वो नञ्सन्ञौ। प्राग्दीव्यतोऽण् से प्राक् की अनुवृत्ति आती है। प्रत्यय, परश्च ड्याप्प्रातिपदिकात्, तद्धिताः, समर्थानां प्रथमाद्वा का अधिकार आ रहा है।

धान्यानां भवने क्षेत्रे खञ् इस सूत्र से पहले के अर्थों में स्त्री और पुंस् प्रातिपदिकों से तद्धितसंज्ञक क्रमशः नञ् और स्नञ् प्रत्यय होते हैं।

दोनों में ञकार इत्संज्ञक हैं।

स्त्रैणः। स्त्री की सन्तान आदि। स्त्रिया अपत्यम् लौकिक विग्रह है। स्त्री डस् से स्त्रीपुंसाभ्यां नञ्सन्ञौ भवनात् से नञ् प्रत्यय, अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके स्त्री+न बना। जित् होने के कारण तद्धितेष्वचामादेः से आदिवृद्धि होने पर ईकार के स्थान पर ऐकार हो गया, स्त्रै+न बना। अट्कुष्वाङ्नुम्व्यवायेऽपि से प्रत्यय के नकार के स्थान पर णकार आदेश होकर स्त्रैण बना। विभक्तिकार्य करके स्त्रैणः सिद्ध हुआ।

पौंस्नः। पुरुष की सन्तान आदि। पुंसः अपत्यम् लौकिक विग्रह है। पुंस् डस् से स्त्रीपुंसाभ्यां नञ्सन्ञौ भवनात् से स्नञ् प्रत्यय, अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके पुंस्+स्न बना। जित् होने के कारण तद्धितेष्वचामादेः से आदिवृद्धि होने पर

उकार के स्थान पर औकार हो गया, पौंस्+स्न बना। पौंस् के सकार का विभक्ति के लुक हो जाने पर भी पूर्व विभक्ति को मान कर पदत्व होने से संयोगान्त लोप करके पौंस्न बना। विभक्तिकार्य करके पौंस्नः सिद्ध हुआ।