औत्सः।
इत्यपत्यादि-विकारान्तार्थ-साधारणप्रत्ययाः॥४४॥
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१००२- उत्सादिभ्योऽञ्। उत्स आदिर्येषां ते उत्सादयस्तेभ्यः। उत्सादिभ्यः पञ्चम्यन्तम्, अञ् प्रथमान्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। प्रत्ययः, परश्च, ड्याप्प्रातिपदिकात्, तद्धिताः, समर्थानां प्रथमाद्वा आदि का अधिकार है। प्राग्दीव्यतोऽण् से प्राक् और दीव्यतः की अनुवृत्ति आती है। अञ् को देखकर अण् निवृत्त होता है। उत्सादिभ्योऽञ् स्यात् प्राग्दीव्यतीयेष्वर्थेषु।
प्राग्दीव्यतीय अर्थों में उत्स आदि गणपठित शब्दों से अञ् प्रत्यय होता है।
ञकार की इत्संज्ञा होती है। जित् होने से आदिवृद्धि होती है। उत्सादिगण में उत्स, उदपान, विकर, विनद, महानद, महानस, महाप्राण, तरुण, तलुन, पृथिवी आदि अनेक शब्द आते हैं।
औत्सः। उत्स अर्थात् झरने में होने वाला मण्डूक आदि। उत्से भवः लौकिक विग्रह और उत्स ङि अलौकिक विग्रह में उत्सादिभ्योऽञ् से अञ् प्रत्यय, अनुबन्धलोप
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करके उत्स+डि+अ की प्रातिपदिकसंज्ञा करके प्रातिपदिक के अवयव सुप् विभक्ति डि का सुपो धातुप्रातिपदिकयोः से लुक् हुआ। उत्स+अ बना। तद्धितेष्वचामादेः से आदिवृद्धि करने पर उकार के स्थान पर औकार हो गया- औत्स+अ बना। यस्येति च से सकारोत्तरवर्ती अकार का लोप हुआ, औत्स+अ बना। वर्णसम्मेलन होने पर औत्स बना। एकदेशविकृतन्यायेन प्रातिपदिक, सु, रुत्व, विसर्ग करके औत्सः सिद्ध हुआ।
परीक्षा
१- तद्धित के विषय में प्रकाश डालिए।
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२- तद्धित में सामान्यतया होने वाले अधिकार सूत्रों के सम्बन्ध में बताइये।
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३- आदिवृद्धि और इवर्णावर्ण के लोप के विषय में प्रकाश डालिए।
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४- उत्सादिभ्योऽञ् के किन्हीं पाँच प्रयोगों की प्रक्रिया दिखाइये।
५
५- दित्यदित्यादित्यपत्युत्तरपदाण्यः के किन्हीं पाँच प्रयोगों की प्रक्रिया दिखाइये।
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६- कृत् और तद्धित की प्रक्रियाओं में अन्तर बताइये।
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श्री वरदराजाचार्य के द्वारा रचित लघुसिद्धान्तकौमुदी में
गोविन्दाचार्य की कृति श्रीधरमुखोल्लासिनी हिन्दी व्याख्या का
तद्धित साधारण प्रत्ययों का प्रकरण पूर्ण हुआ॥४४॥
अथापत्याधिकारः