Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 44
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VṛttiGovind
LSK 1001
वृद्धिविधायकं विधिसूत्रम्
किति च
Aṣṭādhyāyī 7.2.118
Vṛtti Varadarājācārya

किति तद्धिते चाचामादेरचो वृद्धिः स्यात्। बाहीकः।

वार्तिकम्- गोरजादिप्रसङ्गे यत्। गोरपत्यादि गव्यम्।

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

१००१- किति च। किति सप्तम्यन्तं, च अव्ययपदं, द्विपदमिदं सूत्रम्। इस सूत्र में तद्धितेष्वचामादेः पूरा सूत्र, अचो ञ्णिति से अचः और मृजेर्वृद्धिः से वृद्धिः का अनुवर्तन होता है।

कित् तद्धित प्रत्यय के परे होने पर अचों में आदि अच् की वृद्धि होती है।

तद्धितेष्वचामादेः और किति च इन दो सूत्रों का उपयोग जित्, णित् और कित् प्रत्ययों के परे होने पर पूरे तद्धित प्रकरण में होता है। इन सूत्रों से किये गये कार्य को आदिवृद्धि के रूप में जाना जाता है।

बाहीकः। बाहर होने वाला या बाहरी। बहिर्भवः, बहिस् से ईकक् च वार्तिक से ईकक् प्रत्यय के साथ बहिस् में टि इस् का लोप हो गया। बह्+ईक बना। य कित् है, अतः किति च से आदि अच् अकार की वृद्धि हुई, बाह्+ईक बना। वर्णसम्मेलन होकर बाहीक बना। सु, रुत्वविसर्ग करके बाहीकः सिद्ध हुआ।

गोरजादिप्रसङ्गे यत्। यह वार्तिक है। अजादि प्रत्ययों के प्रसंग में गो-शब्द से यत् प्रत्यय होता है, प्राग्दीव्यतीय अर्थों में।

तात्पर्य यह है कि प्राग्दीव्यतीय अर्थों में गो से यदि कोई अजादि प्रत्यय प्राप्त हो तो वह न होकर यत् प्रत्यय हो जाय।

गव्यम्। गौ की सन्तान आदि। गोरपत्यादि। गो+ङस् में प्राग्दीव्यतोऽण् से अण् प्राप्त था। यह अजादि प्रत्यय है। अतः उस सूत्र को बाधकर के गोरजादिप्रसङ्गे यत् से यत् प्रत्यय, तकार का लोप करके गो+य बना। वान्तो यि प्रत्यये से अव् आदेश होकर गव्य बना। तद्धित प्रत्यय करने के बाद प्रातिपदिकसंज्ञा और सुप् का लुक् होता है। प्रातिपदिकत्वेन सु, उसके स्थान में नपुंसकीय अम् आदेश करके पूर्वरूप करने पर गव्यम् सिद्ध हुआ।