हलः परस्य यमो लोपः स्याद् वा यमि। इति यलोपः।
आदित्यः। प्राजापत्यः।
वार्तिकम्- देवाद्यञ्ज्ञौ। दैव्यम्। दैवम्।
वार्तिकम्- बहिषष्टिलोपो यञ्च। बाह्यः।
वार्तिकम्- ईकक् च।
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१०००- हलो यमां यमि लोपः। हलः पञ्चम्यन्तं, यमां षष्ठ्यन्तं, यमि सप्तम्यन्तं, लोपः प्रथमान्तम्, अनेकपदं सूत्रम्। झयो होऽन्यतरस्याम् से अन्यतरस्याम् की अनुवृत्ति आती है।
हल् से परे यम् का विकल्प से लोप होता है यम् के परे होने पर।
यम् प्रत्याहार में य्, व्, र्, ल्, ञ्, म्, ङ्, ण्, न् ये वर्ण आते हैं। यम् के परे रहते यम् के लोप का विधान हुआ है। अतः संख्या की समानता होने के कारण यथासङ्क्षयमनुदेशः समानाम् के अनुसार यथासङ्क्षय नियम प्रवृत्त होगा, जिससे यकार के परे यकार का ही लोप, वकार के परे वकार का ही लोप आदि होंगे। ध्यान रहे कि जिसका लोप किया जा रहा है, उससे पूर्व में झल् प्रत्याहार का वर्ण होना चाहिए। यह कार्य वैकल्पिक है।
आदित्यः। अदिति की सन्तान। अदितेरपत्यम् लौकिक विग्रह है। अदिति ङस् इस अलौकिक विग्रह में दित्यदित्यादित्यपत्युत्तरपदाण्यः से ण्य प्रत्यय हुआ- अदिति ङस् ण्य बना। ण्य में णकार की चुटू से इत्संज्ञा और उसका तस्य लोपः से लोप हुआ- अदिति ङस् य बना। अदिति ङस्+य की तद्धितान्त होने के कारण कृत्तद्धितसमासाश्च से प्रातिपदिकसंज्ञा हो गई और ङस् का सुपो धातुप्रातिपदिकयोः से लुक् हुआ, अदिति+य बना। य णित् है अतः उसके परे होने पर अचों में आदि अच् अदिति के अकार की तद्धितेष्वचामादेः से वृद्धि हुई, अदिति+य बना। यकारादि-प्रत्यय के परे होने पर पूर्व की यचि भम् से भसंज्ञा हुई और उसके इकार का यस्येति च से लोप हुआ- आदित्+य बना। आदित्+य में वर्णसम्मेलन होकर आदित्य बना। सु विभक्ति आई और पुँल्लङ्ग में रामः की तरह आदित्यः सिद्ध हुआ।
आदित्यः। आदित्य की सन्तान। आदित्यस्य अपत्यम् लौकिक विग्रह है। आदित्य ङस् इस अलौकिक विग्रह में दित्यदित्यादित्यपत्युत्तरपदाण्यः से ण्य प्रत्यय
करके अनुबन्धलोप करके प्रातिपदिकसंज्ञा, ङस् का लुक् होकर आदित्य+य बना। आकार के स्थान पर आकार ही आदिवृद्धि हुई। भसंज्ञक अकार का यस्येति च से लोप हुआ- आदित्य+य बना। यकार से यकार परे होने पर हलो यमां यमि लोपः से प्रथम यकार का वैकल्पिक लोप हुआ। हल् है त्, उससे परे यम है प्रथम यकार और यम परे है द्वितीय यकार। अब आदित्य+य बना, वर्णसम्मेलन होकर आदित्य बना। सु, रुत्व और विसर्ग करके आदित्यः सिद्ध हुआ। लोप न होने के पक्ष में आदित्यः बना। यहाँ पर प्रत्यय होने के बाद भी रूप में अन्तर नहीं आया है।
प्राजापत्यः। प्राजापति की सन्तान। प्राजापतेरपत्यम् लौकिक विग्रह है। प्राजापति ङस् इस अलौकिक विग्रह में पति उत्तरपद में होने के कारण दित्यदित्यादित्यपत्युत्तरपदाण्यः से ण्य प्रत्यय हुआ- प्राजापति ङस् ण्य बना। ण्य में णकार की चुटू से इत्संज्ञा और उसका तस्य लोपः से लोप हुआ- प्राजापति ङस् य बना। प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् हुआ, प्राजापति+य बना। तद्धितेष्वचामादेः से प्र में अकार की वृद्धि हुई, प्राजापति+य बना। भसंज्ञक इकार का यस्येति च से लोप करके प्राजापत्य+य, वर्णसम्मेलन करके प्राजापत्य बना। सु, रुत्वविसर्ग करके प्राजापत्यः सिद्ध हुआ।
देवाद्यज्ञज्ञौ। यह वार्तिक है। देव शब्द से प्राग्दीव्यतीय अर्थों में यज् और अज् प्रत्यय होता है।
दोनों प्रत्ययों में जकार की इत्संज्ञा होती है। क्रमशः य और अ शेष रह जाते हैं। जित् का प्रयोजन वृद्धि है। यह वार्तिक प्राग्दीव्यतोऽण् से प्राप्त औत्सर्गिक अण् का अपवाद है।
दैव्यम्, दैवम्। देव की सन्तान आदि। देवस्य अपत्यादि। देव ङस् से अण् प्राप्त था, उसे बाधकर के देवाद्यज्ञज्ञौ से पहले यज् प्रत्यय, जकार का लोप करके प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके देव+य बना। तद्धितेष्वचामादेः से आदिवृद्धि होने पर एकार के स्थान पर एकार आदेश होकर दैव+य बना। यस्येति च से वकारोत्तरवर्ती अकार का लोप, वर्णसम्मेलन करके दैव्य बना। सु, अम् आदेश, पूर्वरूप करके दैव्यम् बना। अज् होने के पक्ष में भी यही प्रक्रिया होकर दैव्+अ=दैव, दैवम् सिद्ध होता है।
बहिषष्टिलोपो यञ्च। यह वार्तिक है। बहिस् से यज् प्रत्यय और उसके संनियोग में टि का लोप भी होता है।
बाह्यः। बाहर होने वाला। बहिर्भवः, बहिस् से बहिषष्टिलोपो यञ्च से यज् प्रत्यय के साथ बहिस् में टि इस् का लोप हो गया। बह्+य बना। य जित् है, अतः तद्धितेष्वचामादेः आदि अच् अकार की वृद्धि हुई, बाह्+य बना। वर्णसम्मेलन होकर बाह्य बना। सु, रुत्वविसर्ग करके बाह्यः सिद्ध हुआ।
ईकक् च। यह वार्तिक है। बहिस् शब्द से ईकक् भी होता है, साथ ही टि का लोप भी होता है।
अन्त्य ककार की इत्संज्ञा होकर ईक शेष रहता है। कित् का फल अग्रिम सूत्र किति च की प्रवृत्ति है।