दित्यादिभ्यः पत्युत्तरपदाच्च प्राग्दीव्यतीयेष्वर्थेषु ण्यः स्यात्।
अणोऽपवादः। दितेरपत्यं दैत्यः। अदितेरादित्यस्य वा-
१९९- दित्यदित्यादित्यपत्युत्तरपदाण्यः। पतिरुत्तरपदं यस्य स पत्युत्तरपदः(शब्दः), दितिश्व अदितिश्च आदित्यश्च पत्युत्तरपदश्च एतेषां समाहारो दित्यदित्यादित्यपत्युत्तरपदम्, तस्मात्। दित्यदित्यादित्यपत्युत्तरपदात् पञ्चम्यन्तं, ण्यः प्रथमान्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। इस सूत्र में तद्धिताः, ङ्याप्प्रातिपदिकात्, प्रत्ययः, परश्च, तद्धिताः, समर्थानां प्रथमाद्वा आदि का अधिकार है साथ ही प्राग्दिव्यतोऽण् का भी अधिकार है।
प्राग्दिव्यतीय अर्थों में दिति, अदिति, आदित्य शब्द और पति उत्तरपद में हो ऐसे शब्दों से 'ण्य' प्रत्यय होता है।
णकार चुटू से इत्संज्ञक है, य बचता है।
दैत्यः दिति की सन्तान। दितेरपत्यम् लौकिक विग्रह है। दिति ङस् इस अलौकिक विग्रह में दित्यदित्यादित्यपत्युत्तरपदाण्यः से ण्य प्रत्यय हुआ- दिति ङस् ण्य बना। ण्य में णकार की चुटू से इत्संज्ञा और उसका तस्य लोपः से लोप हुआ- दिति ङस् य बना। दिति ङस्+य की तद्धितान्त होने के कारण कृत्तद्धितसमासाश्च से प्रातिपदिकसंज्ञा हो गई और ङस् का सुपो धातुप्रातिपदिकयोः से लुक् हुआ, दिति+य बना। य णित् है,
अतः उसके परे होने पर अचों में आदि अच् दिति के दकारोत्तरवर्ती इकार की तद्धितेष्वचामादेः से वृद्धि हुई, इकार की वृद्धि ऐकार होकर दैति+य बना। यकारादि-प्रत्यय के परे होने पर पूर्व की यचि भम् से भसंज्ञा हुई और उसके इकार का यस्येति च से लोप हुआ- दैत्+य बना। दैत्+य में वर्णसम्मेलन होकर दैत्य बना। जब इसकी प्रातिपदिकसंज्ञा हुई थी तब इसका स्वरूप दिति ङस् य था, अब दैत्य बन गया है तो भी एकदेशविकृतन्याय से दैत्य को भी प्रातिपदिक मान लिया गया। इसलिए दैत्य से सु विभक्ति आई और पुँल्लङ्ग में रामः की तरह दैत्यः सिद्ध हुआ।