Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 44
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VṛttiGovind
LSK 998
अण्-प्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
अश्वपत्यादिभ्यश्च
Aṣṭādhyāyī 4.1.84
Vṛtti Varadarājācārya

एभ्योऽण् स्यात् प्राग्दीव्यतीयेष्वर्थेषु।

अश्वपतेरपत्यादि आश्वपतम्। गाणपतम्।

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

९९८- अश्वपत्यादिभ्यश्च। अश्वपतिः आदिर्येषां ते अश्वपत्यादयस्तेभ्यः। अश्वपत्यादिभ्यः पञ्चम्यन्तं, च अव्ययपदं, द्विपदमिदं सूत्रम्। इस सूत्र में तद्धिताः, उच्याप्रातिपदिकात्, प्रत्ययः, परश्च, तद्धिताः, समर्थानां प्रथमाद् वा का अधिकार है। प्राग्दीव्यतोऽण् का भी अधिकार है।

प्राग्दीव्यतीय अर्थों में अश्वपति आदि गणपठित शब्दों से अण् प्रत्यय होता है। अण् में णकार की हलन्त्यम् से इत्संज्ञा होती है। णित् होने के कारण वृद्धि आदि होंगे। आगे तेन दीव्यति खनति जयति जितम् सूत्र कहा गया है, उससे पहले तक के सूत्रों में जो जो भी अर्थ बताये गये हैं, उन अर्थों को प्राग्दीव्यतीय अर्थ कहा गया है। अश्वपति आदि गण में अश्वपति, ज्ञानपति, शतपति, धनपति, गणपति, स्थानपति, यज्ञपति, राष्ट्रपति, कुलपति, गृहपति, पशुपति, धान्यपति, बन्धुपति, धर्मपति, सभापति, प्राणपति और क्षेत्रपति ये शब्द आते हैं।

अण् में णकार की हलन्त्यम् से इत्संज्ञा होती है। णित् होने के कारण वृद्धि आदि होंगे। इस प्रकरण के सभी प्रत्यय प्राग्दीव्यतीय अर्थों में कहे गये हैं। प्राग्दीव्यतोऽण् से लेकर तेन दीव्यति खनति जयति जितम् तक अपत्य, गोत्रापत्य, युवापत्य, सास्य देवता, तस्य समूहः, तदधीते तद्वेद, तत्र जातः, प्रायःभवः, सम्भूत, उप्त, तत्र भवः, तस्य व्याख्यान, तत आगतः, प्रभवति, सोऽस्य निवासः, अभिजन, भक्ति, तेन प्रोक्तम्, तस्येदम्, तस्य विकारः, तस्यावयवः इत्यादि अर्थ आते हैं। इन अर्थों में प्रायः अण् प्रत्यय का ही विधान ये सूत्र करते हैं। जहाँ विशेष प्रत्यय अपेक्षित होता है वहाँ उस प्रत्यय के लिए अपवाद सूत्र बने हुए हैं। उक्त सभी अर्थ तत्तत् प्रकरणों में स्पष्ट हो जायेंगे।

आश्वपतम्। अश्वपति की सन्तान आदि। अश्वपतेरपत्यादि लौकिक विग्रह हैं। अश्वपति डन्स् इस अलौकिक विग्रह में अश्वपत्यादिभ्यश्च से अण् प्रत्यय हुआ- अश्वपति डन्स् अण् बना। अण् में णकार का हलन्त्यम् से इत्संज्ञा और उसका तस्य लोपः से लोप हुआ- अश्वपति डन्स् अ बना। अश्वपति डन्स्+अ की तद्धितान्त होने के कारण कृत्तद्धितसमासाश्च से प्रातिपदिकसंज्ञा हो गई और डन्स् का सुपो धातुप्रातिपदिकयोः से लुक् हुआ, अश्वपति+अ बना। अ णित् है, अतः उसके परे होने पर अचों में आदि अच् अश्वपति के अकार की तद्धितेष्वचामादेः से वृद्धि हुई, आश्वपति+अ बना। अण् के अकार इस अजादि-प्रत्यय के परे होने पर पूर्व की यचि भम् से भसंज्ञा हुई और उसके इकार का यस्येति च से लोप हुआ- आश्वपत्+अ बना। आश्वपत्+अ में वर्णसम्मेलन होकर आश्वपत बना। जब इसकी प्रातिपदिकसंज्ञा हुई थी तब इसका स्वरूप अश्वपति डन्स् अ था, अब आश्वपत बन गया है तो भी एकदेशविकृतन्याय से आश्वपत को प्रातिपदिक मान लिया गया। इसलिए आश्वपत से सु विभक्ति आई और सामान्य की अपेक्षा में नपुंसक मानकर प्रथमा के एकवचन की विवक्षा में सु प्रत्यय, उसके स्थान पर अतोऽम् से अम् आदेश और अमि पूर्वः से पूर्वरूप होकर आश्वपतम् सिद्ध हुआ। इसके रूप सातों विभक्तियों में ज्ञानम् की तरह आश्वपतम्, आश्वपते, आश्वपतानि आदि बनेंगे। यदि विशेष्य पुँल्लिङ्ग का होगा तो रामः की तरह आश्वपतः, आश्वपतौ, आश्वपताः आदि बनेंगे। विशेष्य के स्त्रीलिङ्ग में होने पर स्त्रीत्वविवक्षा में टिड्ढाणञ्० सूत्र से डीप् होकर आश्वपती बनेगा और इसके रूप नदी शब्द की तरह आश्वपती, आश्वपत्यौ, आश्वपत्यः आदि बनेंगे।

गाणपतम्। गणपति की सन्तान आदि। गणपति शब्द अश्वपत्यादिगण में आता है। गणपतेरपत्यादि लौकिक विग्रह है। गणपति ङस् इस अलौकिक विग्रह में अश्वपत्यादिभ्यश्च से अण् प्रत्यय हुआ- गणपति ङस् अण् बना। अण् में णकार का हलन्त्यम् से इत्संज्ञा और उसका तस्य लोपः से लोप हुआ- गणपति ङस् अ बना। गणपति ङस्+अ की तद्धितान्त होने के कारण कृत्तद्धितसमासाश्च से प्रातिपदिकसंज्ञा हो गई और ङस् का सुपो धातुप्रातिपदिकयोः से लुक् हुआ, गणपति+अ बना। अ णित् है, अतः उसके परे होने पर अचों में आदि अच् गणपति के गकारोत्तरवर्ती अकार की तद्धितेष्वचामादेः से वृद्धि हुई, गणपति+अ बना। अकार रूप अजादि-प्रत्यय के परे होने पर पूर्व की यचि भम् से भसंज्ञा हुई और उसके इकार का यस्येति च से लोप हुआ- गणपत्+अ बना। गणपत्+अ में वर्णसम्मेलन होकर गणपत बना। जब इसकी प्रातिपदिकसंज्ञा हुई थी तब इसका स्वरूप गणपति ङस् अ था, अब गणपत बन गया है तो भी एकदेशविकृतन्याय से गणपत को प्रातिपदिक मान लिया गया। इसलिए गणपत से सु विभक्ति आई और सामान्य की अपेक्षा में नपुंसक मान कर प्रथमा के एकवचन की विवक्षा में सु प्रत्यय, उसके स्थान पर अतोऽम् से अम् आदेश और अमि पूर्वः से पूर्वरूप होकर गणपतम् सिद्ध हुआ। इसके रूप सातों विभक्तियों में ज्ञानम् की तरह गणपतम्, गणपते, गणपतानि आदि बनेंगे। यदि विशेष्य पुँल्लिङ्ग का होगा तो रामः की तरह गणपतः, गणपतौ, गणपताः आदि बनेंगे। विशेष्य के स्त्रीलिङ्ग में होने पर स्त्रीत्वविवक्षा में टिड्ढाणञ्० सूत्र से ङीप् होकर गणपती बनेगा और इसके रूप नदी शब्द की तरह गणपती, गणपत्यौ, गणपत्यः आदि बनेंगे।