Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 44
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VṛttiGovind
LSK 997
अधिकारसूत्रम्
समर्थानां प्रथमाद्वा
Aṣṭādhyāyī 4.1.82
Vṛtti Varadarājācārya

इदं पदत्रयमधिक्रियते प्राग्दिश इति यावत्।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

अब तद्धितप्रकरण का प्रारम्भ होता है। तद्धित प्रत्यय हैं, सूत्रसंख्या ४।१।७६ (तद्धिताः ) से लेकर पाँचवें अध्याय के चतुर्थपाद की समाप्ति तक जितने भी प्रत्यय होते हैं, उन सब की तद्धिताः से तद्धितसंज्ञा होती है। तेभ्यः प्रयोगेभ्य हिताः अर्थात् उन प्रयोगों की निष्पत्ति में हितकर सिद्ध होने के कारण जो प्रत्यय हैं, उन्हें तद्धित कहा जाता है। तद्धित प्रत्यय सुबन्त प्रातिपदिकों से होते हैं, धातुओं से नहीं। ये प्रायः किसी अर्थविशेष को लेकर होते हैं। अण्, ठक्, ठञ्, णिनि, मतुप्, घञ्, मयद् आदि अनेकों प्रकार के होते हैं। इन प्रत्ययों के लगने से लोक से लौकिक, वेद से वैदिक, धर्म से धार्मिक, पाणिनि से पाणिनीय, ग्राम से ग्रामीण, राष्ट्र से राष्ट्रिय, मेधा से मेधाविन्, नर से नरत्व, मनुष्य से मनुष्यत्व आदि रूप बनते हैं। तद्धित प्रत्यय करने के बाद समास की तरह तद्धितान्त की भी प्रातिपदिकसंज्ञा होती है और उसके बीच में विद्यमान सुप् का सुपो धातुप्रातिपदिकयोः से लुक् हो जाता है। उसके बाद उस प्रत्यय के परे रहते किए जाने वाले गुण, वृद्धि आदि कार्य होते हैं और एकदेशविकृतन्यायेन सु आदि विभक्तियाँ आती हैं।

९९७- समर्थानां प्रथमाद्वा। समर्थानां षष्ठ्यन्तं, प्रथमाद् पञ्चम्यन्तं, वा अव्ययपदं, त्रिपदमिदं सूत्रम्।

“प्राग्दिशो विभक्तिः ५।३।१॥” तक समर्थानां, प्रथमाद्, वा इन तीनों पदों का अधिकार है।

अधिकार होने से इन पदों का अपने स्थल पर कोई उपयोग नहीं है किन्तु आगे के विधिसूत्रों में उपस्थित होकर इनकी चरितार्थता सिद्ध होती है। तद्धितविधि भी पदसम्बन्धी विधि है। अतः समर्थः पदविधिः सूत्र के अनुसार सामर्थ्य होने पर ही तद्धित प्रत्यय हो सकते हैं।

समर्थः पदविधिः और समर्थानां प्रथमाद्वा इन दो सूत्रों में पठित समर्थ शब्द के अर्थ में अन्तर-

समर्थः पदविधिः सूत्र का सामर्थ्य एकार्थीभाव रूप है। इसीलिए असमर्थ होने पर तद्धित प्रत्यय किये नहीं जा सकते। जैसे- कम्बलम् उपगोरपत्यं देवदत्तस्य (कम्बल तो उपगु नामक व्यक्ति का है और सन्तान देवदत्त की) में उपगु शब्द से अपत्यार्थ में अण् प्रत्यय नहीं हो सकता, क्योंकि उपगु का सम्बन्ध कम्बल से है, अपत्य के साथ में नहीं। अतः सामर्थ्य न होने से प्रत्यय भी नहीं होगा।

समर्थानां प्रथमाद्वा में पठित सामर्थ्य का अर्थ प्रयोग की योग्यता है अर्थात् अर्थबोध कराने में सामर्थ्य वाला ही समर्थ माना जाता है जिसमें तत्तत् सन्धिकार्य हो चुके हों, वही पद अर्थबोध कराने में समर्थ हो सकता है, अकृतसन्धिकार्य पद नहीं। यदि ऐसा सामर्थ्य न लिया जाता तो सु+उत्थितस्य अपत्यम् इस विग्रह में अत इञ् सूत्र से इञ् प्रत्यय होने पर सु+उत्थित+इ इस अवस्था में तद्धितेष्वचामादेः से आदि अच् सु के उकार की वृद्धि करके सौ+उत्थित+इ में आव् आदेश करके सावुत्थित+इ, अकार का लोप, वर्णसम्मेलन आदि करके सावुत्थिति ऐसा अनिष्ट रूप सिद्ध होने लगता परन्तु जब समर्थ अर्थात् कृतसन्धिकार्य से ही प्रत्यय का विधान करेंगे तो सु+उत्थितस्य अपत्यम् इस विग्रह में इञ् प्रत्यय के पहले ही सु+उत्थित में दीर्घ होकर सूत्थित बनने के बाद ही अपत्यार्थ में प्रत्यय होकर आदि अच् सू के उकार की वृद्धि होने पर सौत्थित+इ=सौत्थितिः ऐसा शुद्ध रूप बन सकेगा। अतः इस भ्रम में नहीं रहना चाहिए कि समर्थः पदविधिः से ही सामर्थ्य अर्थ प्राप्त होते हुए समर्थानां प्रथमाद्वा में समर्थ पढ़ना व्यर्थ है।

इस तरह समर्थः पदविधिः के समर्थः का अर्थ- एकार्थीभाव और समर्थानां प्रथमाद्वा के समर्थ का अर्थ- कृत-सन्धिकार्य (कृतं सन्धिकार्यं यस्मिन्) समझना चाहिए।

समर्थानां प्रथमाद्वा इन तीन पदों के अधिकार का फल यह होता है कि समर्थ अर्थात् प्रयोग के योग्य (कृतसन्धिकार्य) और तद्धितप्रत्ययविधायक सूत्रों में प्रथमोच्चरित पद से जिसका बोध होता है, ऐसे समर्थ शब्दों से प्रत्यय हों, विकल्प से, इस अर्थ की उपस्थिति। जैसे कि तस्यापत्यम् इस सूत्र में प्रथमोच्चरित पद तस्य है और उससे उपगोरपत्यम् इत्यादि में उपगोः आदि षष्ठ्यन्त का बोध होता है। अतः इसी (षष्ठ्यन्त) से अण् प्रत्यय होता है, न कि अपत्य शब्द से। वा शब्द के कारण उपगोरपत्यम् ऐसा वाक्य का भी प्रयोग किया जा सकता है अर्थात् सम्पूर्ण तद्धित में एकपक्ष में वाक्य भी हो सकता है।

समर्थानां प्रथमाद्वा के साथ ही ड्याप्प्रातिपदिकात्, प्रत्ययः, परश्च, तद्धिताः का भी प्रायः सभी सूत्रों में अधिकार रहेगा। इस तरह पूरे तद्धित-प्रत्ययविधायक सूत्रों में ड्याप्प्रातिपदिकात्, तद्धिताः, प्रत्ययः, परश्च इन सभी पदों का अधिकार रहता है किन्तु समर्थानां प्रथमाद्वा का अधिकार प्राग्दिशो विभक्तिः के पहले तक रहता है, आगे नहीं।