Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 43
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VṛttiGovind
LSK 996
समासान्तप्रत्ययनिषेधकं विधिसूत्रम्
न पूजनात्
Aṣṭādhyāyī 5.4.69
Vṛtti Varadarājācārya

पूजनार्थात् परेभ्यः समासान्ता न स्युः। सुराजा। अतिराजा।

इति समासान्ताः॥४३॥

इति समासप्रकरणम्।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

९९६- न पूजनात्। न अव्ययपदं, पूजनात् पञ्चम्यन्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। प्रत्ययः, परश्च, तद्धिताः, समासान्ताः आदि पूर्ववत् अधिकृत हैं।

.....

पूजनार्थक( प्रशंसार्थक ) शब्दों से परे आने वाले शब्दों से समासान्त प्रत्यय नहीं होते हैं।

सर्वत्र निषेध नहीं होता, अपितु सु और अति से परे ही निषेध होता है, यह बताने के लिए वैयाकरणसिद्धान्तकौमुदी में स्वतिभ्यामेव ऐसा पढ़ा गया है। इसका तात्पर्य है कि यह निषेध केवल सु और अति इन दो निपातों से परे ही होता है, अन्य पूजनार्थकों से निषेध नहीं होता।

सुराजा। अच्छा राजा। शोभनो राजा लौकिकविग्रह और सु+राजन् सु अलौकिक विग्रह है। कुगतिप्रादयः से तत्पुरुषसमास करके प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके सुराजन् बना। अब राजाहःसखिभ्यष्टच् से समासान्त टच् प्राप्त था, उसका न पूजनात् से निषेध हुआ। अतः सुराजन् से ही प्रातिपदिकत्वेन सु करके राजा की तरह सुराजा सिद्ध हुआ। यदि यहाँ पर टच् का निषेध न होता तो सुराजः ऐसा अनिष्ट रूप होता।

अतिराजा। अच्छा राजा। अतिशयितो राजा लौकिकविग्रह और अति+राजन् सु अलौकिक विग्रह है। कुगतिप्रादयः से तत्पुरुषसमास करके प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके अतिराजन् बना। अब राजाहःसखिभ्यष्टच् से समासान्त टच् प्राप्त था, उसका न पूजनात् से निषेध हुआ। अतः अतिराजन् से ही प्रातिपदिकत्वेन सु करके राजा की तरह अतिराजा सिद्ध हुआ। यदि यहाँ पर टच् का निषेध न होता तो अतिराजः ऐसा अनिष्ट रूप होता।

सु और अति के अतिरिक्त अन्यों से टच् का निषेध नहीं होता। अतः परमश्चासौ राजा में परम सु+राजन् सु में समास करके टच् करने पर परमराजः बन सकता है।

व्याकरणशास्त्र में पृषोदरादीनि यथोपदिष्टम् यह सूत्र अत्यन्त आवश्यक है किन्तु लघुकौमुदीकार ने यहाँ पर इसे स्थान नहीं दिया है फिर भी जिज्ञासुओं के लिए व्याख्या में प्रदर्शित है।

पृषोदरादीनि यथोपदिष्टम्। पृषोदरः आदिर्येषां तानि पृषोदरादीनि। पृषोदरादीनि प्रथमान्तं, यथा अव्ययपदम्, उपदिष्टं प्रथमान्तं, त्रिपदं सूत्रम्। पृषोदर आदि शब्द शिष्टों के द्वारा जैसे उच्चारित या उपदिष्ट हुए हैं, वैसे ही साधु अर्थात् सिद्ध हैं।

तात्पर्य यह है कि अनेक ऐसे शब्द हैं, जिनका प्रकृतिप्रत्यय की प्रक्रिया नहीं की गई है, अपितु शिष्टों ने जैसा उच्चारण किया है, उनकी सिद्धि में जो प्रक्रिया अपेक्षित है, वह करके उन रूपों को सिद्ध मान लेना चाहिए। इसके लिए चाहे कोई सूत्र हो या न हो। जैसे के पृषत् उदरं यस्य में समास करके तकार का लोप करने पर पृष+उदर बनता है। गुण करके पृषोदर बन जाते हैं। यदि तकार का लोप न करते तो पृषदुदरम् बनता किन्तु शिष्टों ने पृषदुदरम् के स्थान पर पृषोदरम् पढ़ा है। अतः यहाँ पर पृषोदर ही साधु माना गया। यद्यपि तकार के लोप के लिए कोई सूत्र नहीं है, फिर भी शिष्टों के द्वारा उच्चारित होने के कारण साधु मान लिया गया। इसी तरह वारिणो वाहकः में वारिवाहकः बनता है। यहाँ वारिवा के स्थान पर वला आदेश मान लिया जाय जिससे वलाहकः बन सके क्योंकि शिष्टों ने वलाहकः का व्यवहार किया है।

इस सूत्र के सम्बन्ध में एक पद्य प्रचलित है-

भवेद्वर्णागमाद्धंसः सिंहो वर्णविपर्ययात्।

गूढोत्मा वर्णविकृतेर्वर्णनाशात् पृषोदरम्।

.....

हसः में अनुस्वार वर्ण का आगम करके हंसः बनता है। इसी तरह हिंस्रः में वर्णों की अदला-बदली करके रेफ का लोप करने पर सिंहः बनता है। एवं गूढः आत्मा में वर्णों की विकृति करके गूढोत्मा बना लिया जाता है और पृषत् उदरम् में वर्णनाश करके पृषोदरम् बनता है।

इसी तरह जिन शब्दों में सूत्रों के द्वारा प्रक्रिया सम्भव न हो, फिर भी शिष्टों ने जिस तरह से पढ़ा है अर्थात् पुरातन ग्रन्थों, काव्यों में जिस तरह से पठित हैं, उनको उसी रूप में साधु माना जाय।

इस तरह समास की प्रक्रिया सामान्य बताई गई। अब इसके बाद आपको तद्धितप्रकरण में प्रवेश करना है। उसके पहले हम अपने आपको परखते हैं कि हम समास की कितनी गहराई तक जा पहुँचे हैं?

परीक्षा

१-

पाँचों समासों में आपने जो अन्तर पाया, उसकी तुलना करें।

१०

२-

समास में खास ध्यान देने योग्य मुख्य बिन्दुओं का उल्लेख करें।

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३-

समास में लौकिक विग्रह और अलौकिक विग्रह पर प्रकाश डालें

१०

४-

तत्पुरुष समास के किन्हीं पाँच प्रयोगों की प्रक्रिया दिखाइये।

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५-

अव्ययीभाव-समास के किन्हीं पाँच प्रयोगों की प्रक्रिया दिखाइये।

१०

६-

बहुव्रीहि-समास के किन्हीं पाँच प्रयोगों की प्रक्रिया दिखाइये।

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७-

द्वन्द्व-समास के किन्हीं पाँच प्रयोगों की प्रक्रिया दिखाइये।

१०

८-

सभी समासों में पूर्वप्रयोग की प्रक्रिया पर प्रकाश डालें।

१०

९-

निम्नलिखित विग्रहों में किस का पूर्व प्रयोग होता है? कारण एवं सूत्र सहित प्रक्रिया दिखाइये- इन्द्रश्च वायुश्च। अर्जुनश्च भीमश्च।

ईशश्च रुद्रश्च। हरिश्च शिवश्च। श्यामश्च रामश्च।

१०

१०-

समासप्रक्रिया पर दो पेज का एक लेख लिखिए-

१०

श्री वरदराजाचार्य के द्वारा रचित लघुसिद्धान्तकौमुदी में

गोविन्दाचार्य की कृति श्रीधरमुखोल्लासिनी हिन्दी व्याख्या का

समासान्त-प्रकरण पूर्ण हुआ।

अथ तद्धितप्रकरणम्

तत्रादौ साधारणप्रत्ययाः