Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 43
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VṛttiGovind
LSK 995
अच्प्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
उपसर्गादध्वनः
Aṣṭādhyāyī 5.4.85
Vṛtti Varadarājācārya

प्रगतोऽध्वानं प्राध्वो रथः।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

९९५- उपसर्गादध्वनः। उपसर्गात् पञ्चम्यन्तम्, अध्वनः पञ्चम्यन्तं, द्विपदं सूत्रम्। अच् प्रत्यन्ववपूर्वात् सामलोम्नः से अच् की अनुवृत्ति आती है। प्रत्ययः, परश्च, समासान्ताः, तद्धिताः का अधिकार है।

प्रादियों से परे अध्वन्-शब्दान्त से समासान्त अच् प्रत्यय होता है।

प्राध्वो रथः। वह रथ जो मार्ग पर चल पड़ा। प्रगतः अध्वानम् लौकिक विग्रह और प्र+अध्वन् अम् अलौकिक विग्रह में अत्यादयः क्रान्ताद्यर्थे द्वितीयया इस वार्तिक से समास करके प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके प्र+अध्वन् बना है। उपसर्गादध्वनः से अच् प्रत्यय करके नस्तद्धिते से अन् इस टिसंज्ञक का लोप करके प्र+अध्व्+अ बना। सवर्णदीर्घ और वर्णसम्मेलन करके प्राध्व बना। स्वादिकार्य करके प्राध्वः सिद्ध हुआ।