Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 43
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VṛttiGovind
LSK 994
अच्प्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
अक्ष्णोऽदर्शनात्
Aṣṭādhyāyī 5.4.76
Vṛtti Varadarājācārya

अचक्षुःपर्यायादक्ष्णोऽच् स्यात् समासान्तः। गवामक्षीव गवाक्षः।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

९९४- अक्ष्णोऽदर्शनात्। दृश्यते इति दर्शनम्। न दर्शनम् अदर्शनं, तस्मात्। अक्ष्णः पञ्चम्यन्तम्, अदर्शनात् पञ्चम्यन्तं, द्विपदं सूत्रम्। अच् प्रत्यन्ववपूर्वात् सामलोम्नः से अच् की अनुवृत्ति आती है। प्रत्ययः, परश्च, समासान्ताः, तद्धिताः का अधिकार है।

यदि अक्षि शब्द चक्षु का वाचक न हो तो अक्षिशब्दान्त से समासान्त अच् प्रत्यय होता है।

गवाक्षः। गाय की आखों जैसी खिड़की, झरोखा। गवाम् अक्षि इव लौकिक विग्रह और गो आम् अक्षि सु अलौकिक विग्रह है। यहाँ पर अक्षि शब्द नेत्र का वाचक नहीं है अपितु नेत्र की तरह छिद्र वाली खिड़की का वाचक है। षष्ठी सूत्र के द्वारा षष्ठीतत्पुरुष समास होने के पश्चात् प्रातिपदिकसंज्ञा, विभक्ति का लुक् करके गो+अक्षि बना। यहाँ पर अवङ् स्फोटायनस्य से अवङ् आदेश, सवर्णदीर्घ होकर गवाक्षि+अ बना। अक्ष्णोऽदर्शनात् से समासान्त अच् प्रत्यय होकर भसंज्ञक अक्षि के इकार का यस्येति च से लोप होकर गवाक्ष बना। स्वादिकार्य करके गवाक्षः सिद्ध होता है।