Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 43
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VṛttiGovind
LSK 993
समासान्त अ-प्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
ऋक्पूरब्धूःपथामानक्षे
Aṣṭādhyāyī 5.4.74
Vṛtti Varadarājācārya

अ अनक्ष इतिच्छेदः। ऋगाद्यन्तस्य समासस्य अप्रत्ययोऽन्तावयवोऽक्षे

या धूस्तदन्तस्य तु न। अर्धर्चः। विष्णुपुरम्। विमलापं सरः। राजधुरा।

अक्षे तु अक्षधूः। दृढधूरक्षः। सखिपथः। रम्यपथो देशः।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

अब समासान्तप्रकरण का प्रारम्भ होता है। यद्यपि वैयाकरणसिद्धान्तकौमुदी आदि में एकशेषसमास, अलुक्समास आदि के भी अलग से प्रकरण दिखाये गये हैं किन्तु लघुसिद्धान्तकौमुदी में उन प्रकरणों के कुछेक सूत्रों का तत्पुरुषादि समासों में उल्लेख करके पृथक् से एतदर्थ कोई प्रकरण नहीं बनाया है। समासान्त प्रत्ययों का भी उल्लेख तत्तत् प्रकरणों में आया है, फिर भी कुछ विशेषतया यहाँ पर उल्लेख करने के लिए इस प्रकरण का अवतरण है।

१९३- ऋक्पूरब्धूःपथामानक्षे। ऋक् च पूश्च आपश्च धूश्च पन्थाश्च तेषामितरेतरद्वन्द्व ऋक्पूरब्धूपन्थानः, तेषाम् ऋक्पूरब्धूपथाम्। न अक्षः अनक्षः, तस्मिन् अनक्षे। ऋक्पूरब्धूपथां पष्ठ्यन्तम्, अ लुप्तप्रथमाकं, अनक्षे सप्तम्यन्तं, त्रिपदं सूत्रम्। प्रत्ययः, परश्च, तद्धिताः, समासान्ताः का अधिकार आ रहा है।

ऋच्, पुर्, अप्, धुर् और पथिन् ये शब्द जिसके अन्त में हों, ऐसे समास से समासान्त अ प्रत्यय होता है परन्तु अक्ष(रथ के चक्के का मध्यमभाग)में जो धुर्(धुरा), उसको बताने वाला धुर् शब्द अन्तिम हो तो नहीं।

अ अनक्ष इतिच्छेदः- इसका तात्पर्य यह है कि सूत्र में स्थित आनक्षे इस पद में अ+अनक्षे ऐसा पदच्छेद है। अनक्षे का निषेध केवल धुर् शब्द के लिए है, क्योंकि उसी में योग्यता है, औरों में नहीं।

अर्धर्चः। ऋचा का आधा भाग। ऋचोऽर्धम् लौकिकविग्रह और ऋच् ङस्+अर्ध सु अलौकिक विग्रह है। अर्ध नपुंसकम् से समास करके प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके ऋच्+अर्ध बना। प्रथमानिर्दिष्ट अर्ध की उपसर्जनसंज्ञा, उसका पूर्वनिपात करके अर्ध+ऋच् बना। आद्गुणः से गुण होकर अर्धर्च् बना। अब ऋक्पूरब्धूःपथामानक्षे से

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समासान्त अच् होकर अर्धर्च+अ बना। वर्णसम्मेलन, प्रातिपदिकत्वेन सु, रुत्वविसर्ग करके अर्धर्चः सिद्ध हुआ। अर्धर्चादिगण में आने के कारण एक पक्ष में अर्धर्चाः पुंसि च से नपुंसक होकर अर्धर्चम् भी होता है।

विष्णुपुरम्। विष्णु की नगरी। विष्णोः पूः लौकिकविग्रह और विष्णु डस्+पुर सु अलौकिक विग्रह है। षष्ठी से तत्पुरुषसमास करके प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके विष्णुपुर बना। प्रथमानिर्दिष्ट विष्णु की उपसर्जनसंज्ञा, उसका पूर्वनिपात। अब ऋक्पूरब्धूः-पथामानक्षे से समासान्त अच् होकर विष्णुपुर+अ बना। वर्णसम्मेलन, प्रातिपदिकत्वेन सु, नपुंसक होने के कारण सु के स्थान पर अम् आदेश एवं पूर्वरूप करने पर विष्णुपुरम् सिद्ध हुआ।

विमलापं सरः। निर्मल जल है जिसका, ऐसा तालाब। विमला आपो यस्य लौकिकविग्रह और विमला जस्+अप् जस् अलौकिक विग्रह है। अनेकमन्यपदार्थे से बहुव्रीहिसमास करके प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके विमला-अप् बना। सवर्णदीर्घ होकर विमलाप् बना। अब ऋक्पूरब्धूःपथामानक्षे से समासान्त अच् होकर विमलाप्+अ बना। वर्णसम्मेलन, प्रातिपदिकत्वेन सु, सरः नपुंसक होने के कारण इसका विशेषण विमलाप भी नपुंसक ही हुआ। सु के स्थान पर अम् आदेश एवं पूर्वरूप करने पर विमलापं सरः सिद्ध हुआ।

राजधुरा। राजा का कार्यभार। राज्ञो धूः लौकिकविग्रह और राजन् डस्+धुर सु अलौकिक विग्रह है। षष्ठी से तत्पुरुषसमास करके प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक्, न लोपः प्रातिपदिकान्तस्य से नलोप करके राज-धुर बना। अब ऋक्पूरब्धूःपथामानक्षे से समासान्त अच् होकर राजधुर+अ बना। वर्णसम्मेलन, धुर-शब्द स्त्रीलिङ्गी होने के कारण अजाद्यतष्टाप् से टाप्, अनुबन्धलोप, सवर्णदीर्घ करके पर राजधुरा बना। प्रातिपदिकत्वेन सु, स्त्रीलिङ्ग होने के कारण इसका हल्ड्याब्ध्यो दीर्घात्सुतिस्यपृक्तं हल् से लोप करने पर राजधुरा सिद्ध हुआ।

अक्षे तु अक्षधूः। सूत्र में अनक्षे पढ़ कर अक्षशब्द के साथ सम्बद्ध जो धुर, तदन्त से अच् प्रत्यय का निषेध किया है। अतः अक्षस्य धूः षष्ठी करने के बाद अच् से रहित अक्षधूः ही बनेगा। इसी तरह दृढधूरक्षः में दृढा धूः यस्य में बहुव्रीहि समास करने के बाद समासान्त अच् प्रत्यय नहीं हुआ। अतः दृढधूः ही बनेगा।

सखिपथः। मित्र का रास्ता। सख्युः पन्थाः लौकिकविग्रह और सखि डस्+पथिन् सु अलौकिक विग्रह है। षष्ठी से तत्पुरुषसमास करके प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके सखिपथिन् बना। अब ऋक्पूरब्धूःपथामानक्षे से समासान्त अच् होकर सखिपथिन्+अ बना। भसंज्ञा करके भस्य टेलोप से पथिन् में टिसंज्ञक इन् का लोप हो गया। सखिपथ्+अ बना। वर्णसम्मेलन होने पर सखिपथ बना। प्रातिपदिकत्वेन सु, रुत्वविसर्ग करने पर सखिपथः सिद्ध हुआ।

रम्यपथो देशः। सुन्दर रास्ता है जिसका, ऐसा देश। रम्यः पन्था यस्य लौकिकविग्रह और रम्य सु+पथिन् सु अलौकिक विग्रह है। अनेकमन्यपदार्थे से बहुव्रीहिसमास करके प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक्, रम्यपथिन् बना। अब ऋक्पूरब्धूःपथामानक्षे से समासान्त अच् होकर रम्यपथिन्+अ बना। भसंज्ञा करके भस्य टेलोप से पथिन् में टिसंज्ञक इन् का लोप हो गया। रम्यपथ्+अ बना। वर्णसम्मेलन होने पर रम्यपथ बना। यह देशः का विशेषण है, अतः पुँल्लिङ्ग रहेगा। प्रातिपदिकत्वेन सु, रुत्वविसर्ग करने पर रम्यपथः सिद्ध हुआ।