Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 42
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VṛttiGovind
LSK 992
समासान्तटच्-प्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
द्वन्द्वाच्चुदषहान्तात् समाहारे
Aṣṭādhyāyī 5.4.106
Vṛtti Varadarājācārya

चवर्गान्ताद् दषहान्ताच्च द्वन्द्वात् टच् स्यात् समाहारे।

वाक् च त्वक् च वाक्त्वचम्। त्वक्स्रजम्। शमीदृषदम्। वाक्त्वपम्।

छत्रोपानहम्। समाहारे किम्? प्रावृट्शरदौ।

इति द्वन्द्वः॥४२॥

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

१९२- द्वन्द्वाच्चुदषहान्तात् समाहारे। चुश्च दश्च धश्च हश्च तेषामितरेतरद्वन्द्वश्चुदषहाः। चुदषहा अन्ते यस्य स चुदषहान्तः, तस्माच्चुदषहान्तात्। द्वन्द्वात् पञ्चम्यन्तं, चुदषहान्तात् पञ्चम्यन्तं, समाहारे सप्तम्यन्तं, त्रिपदमिदं सूत्रम्। राजाहःसखिभ्यष्टच् से टच् की अनुवृत्ति आती है। प्रत्ययः, परश्च, तद्धिताः, समासान्ताः का अधिकार है।

चवर्गान्त, दकारान्त, षकारान्त और हकारान्त द्वन्द्व से समासान्त टच् प्रत्यय होता है समाहार में।

वाक्त्वचम्। वाणी और त्वचा का समुदाय। वाक् च त्वक् च तयोः समाहारः लौकिकविग्रह और वाच् सु त्वच् सु अलौकिक विग्रह है। चार्थे द्वन्द्वः से द्वन्द्वसमास करके प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक करके वाच्+त्वच् बना। वाच् के चकार को चोः कुः से कुत्व होकर ककार बना। अब द्वन्द्वाच्चुदषहान्तात् समाहारे से चवर्गान्त मानकर समासान्त टच् होकर वाक्त्वच्+अ बना। वर्णसम्मेलन, प्रातिपदिकत्वेन सु, समाहारत्वेन नपुंसक एवं एकवचन होकर वाक्त्वचम् सिद्ध हुआ।

त्वक्स्रजम्। त्वचा और माला का समुदाय। त्वक् च स्रज् च तयोः समाहारः लौकिकविग्रह और त्वच् सु स्रज् सु अलौकिक विग्रह है। चार्थे द्वन्द्वः से द्वन्द्वसमास करके प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक करके त्वच्+स्रज् बना। त्वच् के चकार को चोः कुः से कुत्व होकर ककार बना। अब द्वन्द्वाच्चुदषहान्तात् समाहारे से चवर्गान्त मानकर समासान्त टच् होकर त्वक्स्रज्+अ बना। वर्णसम्मेलन, प्रातिपदिकत्वेन सु, समाहारत्वेन नपुंसक एवं एकवचन होकर त्वक्स्रजम् सिद्ध हुआ।

शमीदृषदम्। शमी और पत्थर का समुदाय। शमी च दृषत् च तयोः समाहारः लौकिकविग्रह और शमी सु दृषद् सु अलौकिक विग्रह है। चार्थे द्वन्द्वः से द्वन्द्वसमास करके प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक करके शमी+दृषद् बना। अब द्वन्द्वाच्चुदषहान्तात् समाहारे से दकारान्त मानकर समासान्त टच् होकर शमीदृषद्+अ बना। वर्णसम्मेलन, प्रातिपदिकत्वेन सु, समाहारत्वेन नपुंसक एवं एकवचन होकर शमीदृषदम् सिद्ध हुआ।

वाक्त्विषम्। वाणी और कान्ति का समुदाय। वाक् च त्विट् च तयोः समाहारः लौकिकविग्रह और वाच् सु त्विष् सु अलौकिक विग्रह है। चार्थे द्वन्द्वः से द्वन्द्वसमास करके प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक करके वाच्+त्विष् बना। वाच् के चकार को चोः कुः से कुत्व होकर ककार बना। अब द्वन्द्वाच्चुदषहान्तात् समाहारे से षकारान्त मानकर समासान्त टच् होकर वाक्+त्विष्+अ बना। वर्णसम्मेलन, प्रातिपदिकत्वेन सु, समाहारत्वेन नपुंसक एवं एकवचन होकर वाक्त्विषम् सिद्ध हुआ।

छत्रोपानहम्। छाते और जूतों का समुदाय। छत्रं च उपानहौ च तेषां समाहारः लौकिकविग्रह और छत्र सु उपानह् औ अलौकिक विग्रह है। चार्थे द्वन्द्वः से द्वन्द्वसमास करके प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक करके छत्र+उपानह् बना। गुण होकर छत्रोपानह् बना। अब द्वन्द्वाच्चुदषहान्तात् समाहारे से हकारान्त मानकर समासान्त टच् होकर छत्रोपानह्+अ बना। वर्णसम्मेलन, प्रातिपदिकत्वेन सु, समाहारत्वेन नपुंसक एवं एकवचन होकर छत्रोपानहम् सिद्ध हुआ।

समाहारे किम्? प्रावृट्शरदौ। यदि इस सूत्र में समाहार में हो, ऐसा नहीं कहते तो इतरेतरयोगद्वन्द्व में भी टच् हो जाता। सो न हो, इसके लिए सूत्र में समाहारे ऐसा लिखा गया। अतः प्रावृट् च शरच्च अनयोरितरेतरयोगद्वन्द्वः प्रावृट्शरदौ ही बनता है, न कि प्रावृट्शरदम्।

इस प्रकार से संक्षेप में द्वन्द्व-समास को पूर्ण किया गया है। द्वन्द्व समास के लिए तो एक ही सूत्र चार्थे द्वन्द्वः है किन्तु पूर्वप्रयोग आदि करने के लिए और समास के अन्त में जो प्रत्यय लगते हैं उनका विधान करने के लिए अनेक सूत्र बताये गये हैं, जिनका कुछ विवरण इस लघुसिद्धान्तकौमुदी हुआ। इनका विस्तृत विवरण वैयाकरणसिद्धान्तकौमुदी में किया गया है। विशेष करके वैयाकरणसिद्धान्तकौमुदी में द्वन्द्व समास के बाद अलुक्-समास, एकशेष समास और समासान्तप्रकण भी दिखाये गये हैं। अलुक्-समास में समास होने के बाद भी विभक्ति का लुक् न होना आदि दिखाया गया है। इसी प्रकार समासान्त प्रकरण में समास करने के बाद अन्त में किये जाने वाले प्रत्यय ही बताये गये हैं। यहाँ लघुसिद्धान्तकौमुदी संक्षिप्त रूप से इन सब का दिग्दर्शन मात्र कराया गया है। लघुकौमुदी में एकशेष समास का एक विशेष सूत्र अजन्तपुँल्लिङ्गप्रकरण में सरूपाणामेकशेष एकविभक्तौ बताया गया है और दूसरा एक सूत्र पिता मात्रा इस प्रकरण में।

आप अष्टाध्यायी का नियमित पारायण कर ही रहे होंगे।

अब हम समास के अन्त में आ चुके हैं। संस्कृत भाषा में समास का विशेष महत्त्व है। यदि कोई व्यक्ति व्याकरण के सूत्र न रटकर केवल सुबन्त और तिङन्त के समग्र रूपों को रटकर कथञ्चित् काम चला ले, किन्तु सन्धि और समास की जानकारी के लिए तो व्याकरण की शरण में आना ही पड़ता है। यदि सामान्य समास प्रकरण समझ में आ जाय तो संस्कृत के कठिन से कठिन गद्य और पद्यों का अर्थ आसानी से लग सकता है। इसलिए समास का अध्ययन अच्छी तरह से कर लेना चाहिए। मेरा तात्पर्य यह नहीं है कि समास के अतिरिक्त अन्य प्रकरणों की आवश्यकता नहीं है अपितु यह कहना है कि सामान्य से सामान्य व्यक्ति जो व्याकरण के सूत्रों का रटन और प्रक्रिया में परिश्रम करने में असमर्थ है, वह रूपावली रटकर कथञ्चित् थोड़ा-बहुत काम चला सकता है किन्तु उसे भी समास प्रकरण तो पढ़ना ही पड़ेगा और सम्यक् प्रकारेण शब्दज्ञान करने के लिए तो पूरी व्याकरण-प्रक्रिया आवश्यक है।

वैसे तो संज्ञाप्रकरण से यहाँ तक आप प्रतिदिन कुछ न कुछ आवृत्ति कर ही रहे होंगे अर्थात् पढ़े हुए पाठ को दुहराये रहे होंगे फिर भी समासप्रकरण की आदि से अन्त तक की पूरी प्रक्रिया एक बार फिर दुहरायें। जहाँ सन्देह हो वहाँ अपने गुरु जी या विज्ञ जनों से पूछने में संकोच न करें।

प्रतिदिन ऐसा समय निकालना चाहिए कि अपने सहपाठियों से व्याकरण के सूत्र, प्रक्रिया आदि पर वाद-संवाद हो जाय और जो निर्णय न हो सके उसे गुरु जी से पूछा जाय। जो उदाहरण कौमुदी में दिखाये गये हैं, उनसे भी अलग उदाहरण खोज कर सिद्ध करने की चेष्टा करनी चाहिए। पुस्तक तो एक दिग्दर्शन मात्र कराती है। वह एक दो उदाहरणों को दिखाती है, शेष हजारों, लाखों शब्दों का ज्ञान आपको इन्ही कुछ सूत्रों के माध्यम से करना है। यदि आपने व्याकरणशास्त्र के पढ़ने में ठीक से परिश्रम कर लिया तो अन्य शास्त्रों को पढ़ने में इतना परिश्रम नहीं करना पढ़ेगा किन्तु व्याकरण शास्त्र में परिश्रम नहीं किया तो अन्य शास्त्रों में परिश्रम करना व्यर्थ हो जायेगा। क्योंकि व्याकरणज्ञान अर्थात् शब्दज्ञान के विना किसी शास्त्र में प्रवृत्ति कैसे हो सकती है?

परीक्षा

१-

द्वन्द्वसमास की विशेषता बताइयें

१०

२-

चार्थ क्या हैं? समझाइये।

१०

३-

द्वन्द्व के किन्हीं दस प्रयोगों की समासप्रक्रिया दिखाइये।

१०

४-

पूर्वप्रयोगों के सूत्रों की तुलना करें।

१०

५-

द्वन्द्वाच्चुदषहान्तात् समाहारे की व्याख्या करें।

१०

श्री वरदराजाचार्य के द्वारा रचित सारसिद्धान्तकौमुदी में

गोविन्दाचार्य की कृति श्रीधरमुखोल्लासिनी हिन्दी व्याख्या का

द्वन्द्वसमास पूर्ण हुआ।

अथ समासान्ताः