एषां द्वन्द्व एकवत्।
पाणिपादम्। मार्दङ्गिकवैणविकम्। रथिकाश्वारोहम्।
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प्राणी के अंग, वाद्य के अंग और सेना के अंगों में यदि द्वन्द्वसमास हो तो उनमें समाहार एकवचन ही हो।
प्राणी, तूर्य(वाद्ययन्त्र) और सेना इनके अङ्ग के वाचक शब्दों का द्वन्द्व एकवचनान्त होता है। एकवद्भाव=एकवचनान्त करने का तात्पर्य यह है कि इनका समाहार अर्थ में ही द्वन्द्वसमास होता है, इतरेतरयोग में नहीं। समाहारद्वन्द्व एकवचनान्त ही है, क्योंकि समाहार अर्थात् समूह एक ही होता है।
अतः इनके अंगों में समास के विग्रह बनाते समय ही समाहार का विग्रह बनाना चाहिए।
पाणिपादम्। हाथ और पैर का समूह। पाणी च पादौ च तेषां समाहारद्वन्द्वः। यहाँ चार्थे द्वन्द्वः समास करने के बाद द्वन्द्वश्च प्राणितूर्यसेनाङ्गानाम् से एकवचन का विधान हुआ। सु-विभक्ति आई और समाहार होने के कारण स नपुंसकम् से नपुंसक हुआ। अतः अम् आदेश, पूर्वरूप करके पाणिपादम् सिद्ध हुआ। यदि यह सूत्र न होता तो बहुवचन होकर पाणिपादाः ऐसा अनिष्ट रूप सिद्ध होता। यह प्राण्यङ्ग का उदाहरण है।
मार्दङ्गिकवैणविकम्। मृदंगवादक और वेणुवादकों का समूह। मार्दङ्गिकाश्च वैणविकाश्च तेषां समाहारद्वन्द्वः। यहाँ चार्थे द्वन्द्वः समास करने के बाद द्वन्द्वश्च प्राणितूर्यसेनाङ्गानाम् से वाद्याङ्ग मानकर एकवचन का विधान हुआ। सुविभक्ति, समाहार होने के कारण नपुंसक हुआ है। अतः अम् आदेश, पूर्वरूप करके मार्दङ्गिकवैणविकम् सिद्ध हुआ। यदि यह सूत्र न होता तो बहुवचन होकर मार्दङ्गिकवैणविकाः ऐसा अनिष्ट रूप सिद्ध होता। यह वाद्याङ्ग का उदाहरण है।
रथिकाश्वारोहम्। रथिकों और धुड़सवारों का समूह। रथिकाश्च अश्वारोहाश्च तेषां समाहारद्वन्द्वः। यहाँ चार्थे द्वन्द्वः से समास करने के बाद द्वन्द्वश्च प्राणितूर्यसेनाङ्गानाम् से सेनाङ्ग मानकर एकवचन का विधान हुआ। सुविभक्ति, समाहार होने के कारण नपुंसक हुआ। अतः अम् आदेश, पूर्वरूप करके रथिकाश्वारोहम् सिद्ध हुआ। यह सेनाङ्ग का उदाहरण है। यदि यह सूत्र न होता तो बहुवचन होकर रथिकाश्वारोहाः ऐसा अनिष्ट रूप सिद्ध होता।