मात्रा सहोक्तौ पिता वा शिष्यते। माता च पिता च पितरौ मातापितरौ वा।
९९०- पिता मात्रा। पिता प्रथमान्तं, मात्रा तृतीयान्तं, द्विपदं सूत्रम्। सरूपाणामेकशेष एकविभक्तौ से शेषः और नपुंसकमनपुंसकेनैकवच्चास्यान्यतरस्याम् से अन्यतरस्याम् की अनुवृत्ति आती है।
मातृ-शब्द के साथ उच्चारित पितृ-शब्द का विकल्प से शेष होता है।
यह एकशेष समास का सूत्र है। यहाँ पर शेष का अर्थ है जिसके सम्बन्ध में कहा जा रहा है, उसका शेष और अन्यों का लोप। मातृ और पितृ इन दो शब्दों को समास में यदि एकयोग करके कहा जाय तो केवल पितृ ही शेष रहता है और मातृ का लोप होता है। इस सम्बन्ध में सरूपाणामेकशेष एकविभक्तौ का स्मरण करें। यः शिष्यते स लुप्यमानार्थाभिधायी। जो शेष रहता है वह लुप्त हुए शब्द के अर्थ का भी परिचायक होता है। अतः लुप्त पदों के अर्थ का भी ज्ञान हो जाता है।
अनेक आचार्य इस सूत्र के कार्य को द्वन्द्वसमास नहीं मानते। उनके अनुसार यह कार्य द्वन्द्व समास का अपवाद है। अर्थात् एकशेष भी स्वतन्त्र एक कार्य है। फिर भी लाघव के लिए यहाँ पर पहले द्वन्द्वसमास करके तब एकशेष की प्रक्रिया दिखाई गई है। आप द्वन्द्व के स्थान पर सीधे एकशेष भी कर सकते हैं।
पितरौ, मातापितरौ वा। माता और पिता। माता च पिता च लौकिक विग्रह और मातृ सु पितृ सु अलौकिक विग्रह है। चार्थे द्वन्द्वः से समास होकर प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का
लुक् करके पिता मात्रा सूत्र से पितृ का शेष और मातृ का लोप हो जाता है और यः शिष्यते स लुप्यमानार्थाभिधायी के अनुसार पितृ से माता का भी कथन होने से द्विवचन की प्रतीति हो रही है। अतः द्विवचन में पितरौ बन जाता है। यह एकशेष कार्य वैकल्पिक है। एकशेष न होने के पक्ष में द्वन्द्वसमास होकर मातापितरौ ही बनता है। यहाँ पर मातृ शब्द का ही पूर्वप्रयोग होता है क्योंकि पितुर्दशगुणा माता गौरवेणातिरिच्यते अर्थात् पिता से माता दशगुण अधिक गौरवमयी होती है, इत्यादि वचनों से माता अभ्यर्हित अर्थात् पूज्या होने के कारण अभ्यर्हितं च वार्तिक से मातृशब्द का पूर्वप्रयोग होता है और आनङ्गतो द्वन्द्वे सूत्र से मातृ के ऋकार के स्थान पर आनङ्ग आदेश होकर मातापितृ बनता है। द्वित्व की विवक्षा में द्विवचन औ एवं ऋतो ङिसर्वनामस्थानयोः से गुण करके मातापितरौ सिद्ध होता है। १११- द्वन्द्वश्च प्राणितूर्यसेनाङ्गानाम्। प्राणी च तूर्यञ्च सेना तेषामितरेतरयोगद्वन्द्वः प्राणितूर्यसेनाः, तासामङ्गानि प्राणितूर्यसेनाङ्गानि, तेषां प्राणितूर्यसेनाङ्गानाम्। द्वन्द्वः प्रथमान्तं, च अव्ययपदं, प्राणितूर्यसेनाङ्गानां षष्ठ्यन्तं, त्रिपदमिदं सूत्रम्। द्विगुरेकवचनम् से एकवचनम् की अनुवृत्ति आती है।