शिवकेशवौ।
९८९- अल्पाच्तरम्। अल्पः अच् यस्य तद् अल्पाच् (पदम्) बहुव्रीहिः। अल्पाच् एव अल्पाल्तरम्, स्वार्थे तरप्। अल्पाच्तरं प्रथमान्तम् एकपदमिदं सूत्रम्। इस सूत्र में द्वन्द्वे घि से द्वन्द्वे और उपसर्जनं पूर्वम् से पूर्वम् की अनुवृत्ति आती है।
द्वन्द्व-समास के सभी शब्दों में जो शब्द अत्यन्त कम अच् वाला हो, उसका ही पूर्वप्रयोग होता है।
शिवकेशवौ। शिव और केशव। शिवश्च केशवश्च लौकिक विग्रह और शिव सु+केशव सु अलौकिक विग्रह में चार्थे द्वन्द्वः से समास हुआ। प्रातिपदिकसंज्ञा, सु का लुक, शिवकेशव बना। यहाँ पर कोई भी शब्द घिसंज्ञक नहीं है। अतः द्वन्द्वे घि का विषय नहीं है। अदन्त तो है किन्तु अजादि नहीं है, अतः अजाद्यदन्तम् का भी विषय नहीं है, तो पूर्व प्रयोग किस का हो? तब अल्पाच्तरम् इस सूत्र ने निर्णय दिया कि जिस शब्द में कमसे कम अच् हों उसका ही पूर्व में प्रयोग होना चाहिए। शिव में दो अच् हैं और केशव में तीन अच् हैं। दोनों में से अल्पाच्तर शिव शब्द है, इसलिए शिव का पूर्वप्रयोग हुआ। दो की संख्या है, इसलिए द्विवचन औ, वृद्धि आदि करके शिवकेशवौ सिद्ध हुआ।