द्वन्द्वे पूर्वं स्यात्। ईशकृष्णौ।
९८८- अजाद्यदन्तम्। अच् आदिर्यस्य तद् अजादि। अत् अन्तो यस्य तद् अदन्तम्। अजादि च तददन्तम्- अजाद्यदन्तम्। अजाद्यदन्तं प्रथमान्तम् एकपदमिदं सूत्रम्। इस सूत्र में द्वन्द्वे घि से द्वन्द्वे की और उपसर्जनं पूर्वम् से पूर्वम् की अनुवृत्ति आती है।
द्वन्द्व-समास में जो शब्द अजादि और अदन्त हो तो उसका पूर्व में प्रयोग करना चाहिए।
ईशकृष्णौ। ईश और कृष्ण। ईशश्च कृष्णश्च लौकिक विग्रह और ईश सु+कृष्ण सु अलौकिक विग्रह में चार्थे द्वन्द्वः से समास हुआ। प्रातिपदिकसंज्ञा, सु का लुक, ईश+कृष्ण बना। यहाँ पर कोई भी शब्द घिसंज्ञक नहीं है। अतः द्वन्द्वे घि का विषय नहीं है तो पूर्व प्रयोग किस का हो? अब अजाद्यदन्तम् इस सूत्र ने निर्णय दिया कि जो शब्द अजादि भी हो और अदन्त भी हो, उसका ही पूर्व में प्रयोग होना चाहिए। ईश+कृष्ण में ईश शब्द अजादि और अदन्त दोनों है, अतः ईश का पूर्वप्रयोग हुआ। दो की संख्या है, इसलिए द्विवचन में औ, वृद्धि आदि करके ईशकृष्णौ सिद्ध हुआ।