द्वन्द्वे घिसंज्ञं पूर्वं स्यात्। हरिश्च हरश्च हरिहरौ।
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९८७- द्वन्द्वे घि। द्वन्द्वे सप्तम्यन्तं, घि प्रथमान्तम्। द्विपदमिदं सूत्रम्। इस सूत्र में उपसर्जनं पूर्वम् से पूर्वम् की अनुवृत्ति आती है।
द्वन्द्वसमास में घिसंज्ञक शब्द पूर्व में प्रयुक्त होता है।
इस सूत्र से यह विधान किया गया है कि यदि ऐसा घिसंज्ञक शब्द द्वन्द्व समास में आता है तो समास के बाद उस शब्द का आदि में अर्थात् पूर्व में प्रयोग करना चाहिए। स्मरण रहे कि शेषो घ्यसखि इस सूत्र से ह्रस्व-इकारान्त और ह्रस्व उकारान्त की घिसंज्ञा होती है।
हरिहरौ। हरि और हर (विष्णु और शिव)। हरिश्च हरश्च लौकिक विग्रह और हरि सु+हर सु अलौकिक विग्रह में चार्थे द्वन्द्वः से समास हुआ। प्रातिपदिकसंज्ञा, सु का लुक, हरि+हर बना। अब यहाँ पर प्रश्न आया कि पूर्वप्रयोग किसका होना चाहिए? तो द्वन्द्वे घि इस सूत्र ने निर्णय दिया कि घिसंज्ञक शब्द का पूर्वप्रयोग होना चाहिए। यहाँ इकारान्त होने के कारण हरि शब्द घिसंज्ञक है, अतः हरि का पूर्वप्रयोग हुआ हरिहर बना। यहाँ पर विग्रह में ही हरि शब्द का पूर्व में प्रयोग किया गया है। यदि कथंचित् हरश्च हरिश्च ऐसा विग्रह होता तो भी घिसंज्ञक हरि का ही पूर्वप्रयोग होता है अथवा यूँ कहा जाय कि द्वन्द्वे घि को देखते हुए विग्रह में ही घिसंज्ञक का पूर्वप्रयोग किया जाता है। हरिहर इस में दो की संख्या होने के कारण द्विवचन औ विभक्ति करके रामौ की तरह हरिहरौ बनाना चाहिए।
इसी प्रकार- हरिहरगुरुवः। हरि, हर और गुरु। हरिश्च हरश्च गुरुश्च लौकिक विग्रह और हरि सु+हर सु+गुरु सु अलौकिक विग्रह में चार्थे द्वन्द्वः से समास हुआ। प्रातिपदिकसंज्ञा, सु का लुक, हरि+हर+गुरु बना। अब यहाँ पर प्रश्न आया कि पूर्वप्रयोग किसका होना चाहिए तो द्वन्द्वे घि इस सूत्र ने निर्णय दिया कि घिसंज्ञक शब्द का पूर्वप्रयोग होना चाहिए। यहाँ इकारान्त होने के कारण हरि और उकारान्त होने के कारण गुरु शब्द घिसंज्ञक हैं, ऐसी स्थिति में किसी एक अधिक पूज्य अर्थ का वाचक घिसंज्ञक का पूर्वप्रयोग होकर अन्य घिसंज्ञक का बीच में या अन्त में कहीं प्रयोग कर सकते हैं। अतः दोनों घिसंज्ञकों में अधिक पूज्य हरि का पूर्वप्रयोग हुआ हरिहरगुरु बना। तीन की संख्या होने के कारण बहुवचन जस् आया और पूर्वसवर्णदीर्घ और रुत्वविसर्ग होकर हरिहरगुरुवः सिद्ध हुआ।