एषु पूर्वप्रयोगार्हं परं स्यात्। दन्तानां राजानो राजदन्ताः।
वार्तिकम्- धर्मादिष्वनियमः। अर्थधर्मो। धर्मार्थवित्यादि।
९८६- राजदन्तादिषु परम्। राजदन्त आदिर्येषां ते राजदन्तादयः, तेषु राजदन्तादिषु। राजदन्तादिषु सप्तम्यन्तं, परं प्रथमान्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। उपसर्जनं पूर्वम् से पूर्वम् की अनुवृत्ति आती है और प्रयुज्यते इस क्रिया का अध्याहार किया जाता है।
राजदन्त आदि गण में पूर्वनिपात के योग्य पद का परनिपात होता है।
राजदन्ताः। दाँतों का राजा अर्थात् ऊपर सामने के दाँत। दन्तानां राजा लौकिक विग्रह और दन्त आम्+राजन् सु अलौकिक विग्रह है। ऐसे में षष्ठी सूत्र से तत्पुरुष समास, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके षष्ठी इस प्रथमान्तपद से निर्दिष्ट दन्त की उपसर्जनसंज्ञा होकर उसका उपसर्जनं पूर्वम् से पूर्वनिपात प्राप्त था, उसे बाधकर के राजदन्तादिषु परम् से परप्रयोग अर्थात् परनिपात हुआ- राजन्+दन्त बना। न लोपः प्रातिपदिकान्तस्य से नकार का लोप, प्रातिपदिकत्वेन विभक्ति, जस्, दीर्घ, सकार को रुत्वविसर्ग आदि करके राजदन्ताः सिद्ध हुआ।
धर्मादिष्वनियमः। यह वार्तिक है। धर्म आदि गणपठित शब्दों में पूर्वनिपात या परनिपात का कोई निश्चित नियम नहीं है। अर्थात् इस गण में पढ़े गये सभी शब्दों में से किसी भी शब्द का पूर्वप्रयोग किया जा सकता है। अतः धर्मश्च अर्थश्च में द्वन्द्व-समास करके धर्मार्थों या अर्थधर्मों दोनों प्रयोग बन सकते हैं।