Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 42
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VṛttiGovind
LSK 985
द्वन्द्व-समासविधायकं विधिसूत्रम्
चार्थे द्वन्द्वः
Aṣṭādhyāyī 2.2.29
Vṛtti Varadarājācārya

अनेकं सुबन्तं चार्थे वर्तमानं वा समस्यते, स द्वन्द्वः।

समुच्चयान्वाचयेतरेतरयोगसमाहाराश्चार्थाः।

तत्र 'ईश्वरं गुरुं च भजस्व' इति परस्परनिरपेक्षस्यानेकस्यैकस्मिन्नन्वयः समुच्चयः।

'भिक्षाम् अट गां चानय' इत्यन्यतरस्यानुषङ्गिकत्वेनान्वयोऽन्वाचयः।

अनयोरसामर्थ्यात् समासो न।

'धवखदिरौ छिन्धि' इति मिलितानामन्वय इतरेतरयोगः।

'संज्ञापरिभाषम्' इति समूहः समाहारः।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

अब द्वन्द्वसमास प्रारम्भ होता है। यह पाँचवाँ समास है। इस समास के लिए एक ही सूत्र है- चार्थे द्वन्द्वः। इस समास में समस्यमान पद प्रायः प्रथमान्त ही होते हैं और कहीं कहीं अन्य विभक्तियाँ भी हो सकती हैं किन्तु प्रथमान्त में ही समास करने की रीति ज्यादा प्रचलित है।

९८५- चार्थे द्वन्द्वः। चस्य अर्थश्चार्थः, (षष्ठीतत्पुरुषः) तस्मिन्। चार्थे सप्तम्यन्तं, द्वन्द्वः प्रथमान्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। इस सूत्र में अनेकमन्यपदार्थे से अनेकम् तथा सुबामन्त्रिते पराङ्गवत्स्वरे से सुप् की अनुवृत्ति आती है। समासः और विभाषा का अधिकार पहले से ही चला आ रहा है।

चकार के अर्थ में वर्तमान अनेक सुबन्तों का समास होता है और उसकी द्वन्द्वसंज्ञा होती है।

अब जिज्ञासा होती है कि चकार का अर्थ (चार्थ) क्या है?

समुच्चयान्वाचयेतरेतरयोगसमाहाराश्चार्थाः। समुच्चय, अन्वाचय, इतरेतरयोग और समाहार ये चार चकार के अर्थ हैं।

समुच्चय- जब परस्पर निरपेक्ष अनेक पद किसी एक में अन्वित होते हैं तो वहाँ समुच्चय नामक चार्थ रहता है। जैसे- 'ईश्वरं गुरुं च भजस्व' ईश्वर को भजो और गुरु को भी। यहाँ पर एक कर्म ईश्वर का भजन-क्रिया के साथ अन्वय हो रहा है और उसी

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क्रिया की आवृत्ति करके दूसरे कर्म गुरु का भी अन्वय होता है। यहाँ पर ईश्वर और गुरु दोनों परस्पर निरपेक्ष हैं। अतः दोनों का स्वतन्त्र रूप से भजन-क्रिया में अन्वय होता है। इस लिए यहाँ पर समुच्चय नामक चार्थ है। ईश्वर और गुरु दोनों पदों में समास होने के लिए सामर्थ्य नहीं है। अतः इस चार्थ में समास नहीं होता।

अन्वाचयः- जब समुच्चयमान (जिनका समुच्चय हो रहा हो) पदार्थों में एक का आनुषंगिकतया (गौणरूप से) अन्वय हो, तब उसे अन्वाचय नामक चार्थ कहा जाता है। जैसे 'भिक्षाम् अट गां चानय' भिक्षार्थ भ्रमण करो, यदि मार्ग में गाय मिले तो उसे भी लेते आना, इस वाक्य में भिक्षार्थ अटन अनिवार्य है और गाय का आनयन साथ में करना है अर्थात् आनुषंगिक गौण है। इस लिए यह अन्वाचय है। इन दोनों में क्रियाओं की भिन्नता और एक प्रधान और एक अप्रधान कर्म होने के कारण दोनों के कर्म में परस्पर आकांक्षा न होने से सामर्थ्य नहीं है। सामर्थ्य न होने पर समास भी नहीं होगा। इतरेतरयोग और समाहार में तो सामर्थ्य रहता है, इसलिए उनमें समास हो जाता है।

इतरेतरयोग- जब पदार्थ परस्पर में मिलकर आगे अन्वित होते हैं, तब उसे इतरेतरयोग चार्थ कहा जाता है। जैसे- धवखदिरौ छिन्धि। धव और खदिर के वृक्षों को काटो। यहाँ पर धव और खदिर दोनों मिलकर छिन्धि क्रिया में अन्वित हो जाते हैं। यह इतरेतरयोग है। यहाँ पर सामर्थ्य है। इतरेतरयोग में समास होने के बाद अन्तिम शब्द के अनुसार लिङ्ग और वचन की व्यवस्था होती है। जैसे धवखदिरौ में धव और खदिर दो हैं इसलिए द्विवचन और रामकृष्णहरयः में राम, कृष्ण और हरि तीन हैं, अतः बहुवचन हुआ।

धवश्च खदिरश्च लौकिक विग्रह और धव सु+खदिर सु अलौकिक विग्रह में चार्थे द्वन्द्वः से समास हुआ। प्रातिपदिकसंज्ञा, सु का लुक्, धवखदिर बना। औ विभक्ति करके रामौ की तरह धवखदिरौ बन जाता है।

इसी तरह- रामकृष्णौ। रामश्च कृष्णश्च लौकिक विग्रह और राम सु+कृष्ण सु अलौकिक विग्रह में चार्थे द्वन्द्वः से समास हुआ। प्रातिपदिकसंज्ञा, सु का लुक्, रामकृष्ण बना। औ विभक्ति करके रामौ की तरह रामकृष्णौ बन जाता है।

हरिकृष्णरामाः। हरिश्च कृष्णश्च रामश्च लौकिक विग्रह और हरि+सु कृष्ण सु+राम+सु अलौकिक विग्रह में चार्थे द्वन्द्वः से समास हुआ। प्रातिपदिकसंज्ञा, सु का लुक्, हरिकृष्णराम बना। तीन संख्या होने के कारण बहुवचन जस् विभक्ति करके हरिरामकृष्णाः। बन जाता है।

समाहार- जब दो या दो से अधिक पदार्थों का अलग-अलग रूप से क्रिया में अन्वय न होकर समूहात्मक अर्थ का अन्वय होता है तो उसे समाहार नामक चार्थ कहा जाता है। समूह का नाम समाहार है। जैसे- सञ्ज्ञापरिभाषम्। सञ्ज्ञा और परिभाषा का समूह। संज्ञा च परिभाषा च अनयोः समाहारः लौकिक विग्रह और संज्ञा सु+परिभाषा सु अलौकिक विग्रह में चार्थे द्वन्द्वः से समास हुआ। प्रातिपदिकसंज्ञा, सु का लुक्, संज्ञापरिभाषा बना। समाहार होने पर स नपुंसकम् से नपुंसकलिङ्ग और समूहार्थ के एक होने से एकवचन मात्र होता है। सु विभक्ति करके ह्रस्वो नपुंसके प्रातिपदिकस्य से परिभाषा के आकार को ह्रस्व करने पर संज्ञापरिभाषा बना। सु के स्थान पर अम् आदेश, पूर्वरूप करके ज्ञानम् की तरह सञ्ज्ञापरिभाषम् बन जाता है।

हस्तचरणम्। हस्तश्च चरणश्च अथवा हस्तौ च चरणौ च एतेषां समाहारः

यह लौकिक विग्रह और हस्त सु+चरण सु अथवा हस्त औ चरण औ अलौकिक विग्रह में चार्थे द्वन्द्वः से समास हुआ। प्रातिपदिकसंज्ञा, सु का लुक्, हस्तचरण बना। समाहार होने पर नपुंसकलिङ्ग और एकवचन मात्र होता है। सु विभक्ति करके ज्ञानम् की तरह हस्तचरणम् बन जाता है।

विशेषः- प्रश्न- द्वन्द्व समास में किसका पूर्वप्रयोग किया जाय? उत्तर- द्वन्द्वसमास में समस्यमान दोनों पदों के अर्थ प्रधान होते हैं और समास करने वाले सूत्र चार्थे द्वन्द्वः में अनेकम् ऐसा अनुवृत्त प्रथमान्त पद से निर्दिष्ट सभी शब्द होते हैं। सबकी उपसर्जनसंज्ञा होकर सभी का पूर्वप्रयोग प्राप्त होता है। अतः इच्छानुसार किसी को भी पहले रखा जा सकता है किन्तु कहीं-कहीं विशेष जगहों पर इच्छानुसार पूर्वप्रयोग नहीं किया जा सकता है क्योंकि उसके लिए विशेष नियम बनाये गये हैं, जो आगे दिये जा रहे हैं।