अनुक्तसमासान्ताद् बहुव्रीहेः कव्वा। महायशस्कः, महायशाः।
इति बहुव्रीहिः॥४१॥
१८४- शेषाद्विभाषा। शेषात् पञ्चम्यन्तं, विभाषा प्रथमान्तं, द्विपदं सूत्रम्। बहुव्रीहौ सक्थ्यक्षणोः स्वाङ्गात् षच् से विभक्तिविपरिणाम करके बहुव्रीहेः तथा उरःप्रभृतिभ्यः कप् से कप् की अनुवृत्ति आती है। प्रत्ययः, परश्च, तद्धिताः, समासान्ताः का अधिकार आ रहा है।
जिस बहुव्रीहि में कोई समासान्त न कहा गया हो तो उससे कप् प्रत्यय होता है विकल्प से।
उक्तादन्यः शेषः। कथन के बाद बाकी जो है, उसे शेष कहते हैं। यहाँ पर जिन शब्दों का बहुव्रीहि में कोई समासान्त प्रत्यय नहीं कहे गये हैं, ऐसे शब्द शेष कहलाते हैं।
महायशस्कः, महायशाः। बड़े यश वाला व्यक्ति। महद् यशः यस्य (पुरुषस्य) लौकिक विग्रह और महत् सु+यशस् सु अलौकिक विग्रह में अनेकमन्यपदार्थों से समास हुआ। प्रातिपदिकसंज्ञा हुई और सुपो धातुप्रातिपदिकयोः से दोनों सु का लोप करके महत्+यशस् बना। आन्महतः समानाधिकरणजातीययोः से महत् के तकार के स्थान पर आकार आदेश होकर मह+आ में सवर्णदीर्घ करके महायशस् बना। इस शब्द से बहुव्रीहि में अन्य कोई समासान्त प्रत्यय का विधान नहीं किया गया है। अतः यह शेष है। इस लिए शेषाद्विभाषा से विकल्प से समासान्त कप् प्रत्यय हुआ- महायशस्+क बना। अब एकदेशविकृतन्यायेन प्रातिपदिक मानकर सु विभक्ति, रुत्वविसर्ग करके महायशस्कः सिद्ध
.....
हुआ। कप् न होने के पक्ष में महायशस्+स् है। सु के सकार का हल्ड्याब्य्यो दीर्घात्सुतिस्यपृक्तं
हल् से लोप, अत्वसन्तस्य चाधातोः से उपधादीर्घ करके महायशास् बना। सकार को
रुत्वविसर्ग करके महायशाः बन गया।
बहुव्रीहि समास अत्यन्त सरल है, एक ही सूत्र अनेकमन्यपदार्थे से अनेक स्थलों
पर समास किया जाता है। यद्यपि पाणिनीयाष्टाध्यायी में अन्य चार सूत्र भी हैं इस समास
में किन्तु अन्य सूत्र कुछ शब्दों में समास करने की योग्यता रखते हैं परन्तु यह सूत्र लगभग
सभी बहुव्रीहियोग्य स्थलों पर समास करने की योग्यता रखता है। इसलिए लघुसिद्धान्तकौमुदी
में यह एक ही सूत्र निर्दिष्ट है।
यहाँ आकर आपको फिर स्मरण करा रहा हूँ कि आप पाणिनीयाष्टाध्यायी का
नियमित पारायण कर ही रहे होंगे। एक महीने में एक अध्याय के नियम से पाठ करने पर
विशेष प्रतिभासम्पन्न छात्र आठ ही माह में सम्पूर्ण अष्टाध्यायी कण्ठस्थ कर लेते हैं और
जो सामान्य प्रतिभा वाले छात्र हैं वे भी दूसरी आवृत्ति अर्थात् सोलह महीने में अवश्य
कण्ठस्थ कर लेंगे। यह मैंने अपने छात्रों से करवाया है। अतः अनुभूत है। इसके अच्छे
परिणाम आये हैं। इसलिए आपको भी बार-बार निर्देश दे रहे हैं। अष्टाध्यायी के सारे सूत्र
याद हो जाने चाहिए, तभी व्याकरण का ज्ञान पूर्ण हो सकता है। लघुसिद्धान्तकौमुदी और
पाणिनीयाष्टाध्यायी दोनों साथ-साथ पूरी हो जायें तो अच्छा है।
परीक्षा
१-
तत्पुरुष-समास और बहुव्रीहि-समास में आपने क्या अन्तर पाया?
५
२-
बहुव्रीहि-समास के विग्रह में अधिकतर कौन कौन सी विभक्तियाँ
होती हैं?
५
३-
बहुव्रीहि-समास के किन्हीं बीस शब्दों की समास-प्रक्रिया दिखाइये।
२०
४-
पुंवद्भाव और ह्रस्व के किन्हीं पाँच उदाहरणों को प्रक्रिया
सहित बताइये।
५
५-
स्त्रियाः पुंवद्भाषितपुंस्कादनूड् समानाधिकरणे स्त्रियामपूरणीप्रियादिषु
इस सूत्र की व्याख्या कीजिए।
१०
६-
गोस्त्रियोरुपसर्जनस्य की व्याख्या कीजिए।
५
७-
नञ् समास के पाँच उदाहरण सूत्रसहित दर्शाइये।
५
श्री वरदराजाचार्य के द्वारा रचित लघुसिद्धान्तकौमुदी में
गोविन्दाचार्य की कृति श्रीधरमुखोल्लासिनी हिन्दी व्याख्या का
बहुव्रीहिसमास पूर्ण हुआ।
अथ द्वन्द्वः