निष्ठान्तं बहुव्रीहौ पूर्वं स्यात्। युक्तयोगः।
१८३- निष्ठा। प्रथमान्तमेकपदं सूत्रम्। सप्तमीविशेषणे बहुव्रीहौ से बहुव्रीहौ और उपसर्जनं पूर्वम् से पूर्वम् की अनुवृत्ति आती है।
बहुव्रीहि समास में निष्ठाप्रत्ययान्त शब्द का पूर्व में प्रयोग होता है।
क्तक्तवतू निष्ठा से क्त और क्तवतु प्रत्ययों की निष्ठा संज्ञा की गई है। प्रत्ययग्रहणे तदन्तग्रहणम् अर्थात् प्रत्यय के ग्रहण में प्रत्ययान्त का ग्रहण होता है इस नियम के अनुसार क्त या क्तवतु प्रत्ययान्त शब्द का इस सूत्र पर ग्रहण होगा। इस तरह बहुव्रीहि समास में क्तप्रत्ययान्त एवं क्तवतुप्रत्ययान्त का ही पूर्वनिपात होता है।
युक्तयोगः। सफल हुआ है योग जिसका। युक्तो योगो यस्य लौकिक विग्रह और युक्त सु योग सु अलौकिक विग्रह है। युज् धातु से क्त प्रत्यय होकर युक्त बना है। ऐसी स्थिति में अनकेमन्यपदार्थों से समास हुआ और निष्ठा से क्त प्रत्ययान्त युक्त का पूर्वनिपात हुआ। प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके युक्तयोग बना। स्वादिकार्य से युक्तयोगः सिद्ध हुआ।
इसी तरह अनेक उदाहरण इसके हो सकते हैं। जैसे कि कृतकृत्यः। कर लिया अपना कर्तव्य जिसने। कृतं कृत्यं येन लौकिक विग्रह और कृत सु कृत्य सु अलौकिक विग्रह है। कृ धातु से क्त प्रत्यय होकर कृत बना है। ऐसी स्थिति में अनकेमन्यपदार्थों से समास हुआ और निष्ठा से क्त प्रत्ययान्त कृत का पूर्वनिपात हुआ। प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके कृतकृत्य बना। स्वादिकार्य से कृतकृत्यः सिद्ध हुआ।