Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 41
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VṛttiGovind
LSK 980
सकारादेशविधायकं विधिसूत्रम्
सोऽपदादौ
Aṣṭādhyāyī 8.3.38
Vṛtti Varadarājācārya

पाशकल्पककाम्येषु विसर्गस्य सः।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

९८०- सोऽपदादौ। पदम् आदिर्यस्य स पदादिः, न पदादिरपदादिस्तस्मिन् अपदादौ। सः प्रथमान्तम्, अपदादौ सप्तम्यन्तं, द्विपदं सूत्रम्। विसर्जनीयस्य सः से विसर्जनीयस्य और कुष्वो क क पौ च से कुष्वोः एवं तयोर्व्यावचि संहितायाम् से संहितायाम् की अनुवृत्ति आती है।

पाश, कल्प, क, काम्य इन चार प्रत्ययों के परे रहते विसर्ग के स्थान पर स आदेश होता है।

अपदादौ का वचनविपरिणाम करके कुष्वोः का विशेषण बनाया जाता है। इस तरह अपदाद्योः कुष्वोः बन जाता है। अर्थ बनता है- अपदादि कवर्ग और पवर्ग के परे होने पर। अपदादि कवर्ग और पवर्ग के परे रहना केवल पाश, कल्प, क, काम्य इन चार प्रत्ययों में ही सम्भव है। अतः मूलकार ने अर्थ में अपदाद्योः कुष्वोः का अर्थ पाश, कल्प, क, काम्य प्रत्ययों के परे होने पर ऐसा कहा। यह सूत्र कुष्वो क क पौ च से प्राप्त जिह्वामूलीय और उपध्मानीय विसर्ग का बाधक है।