Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 41
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Govind
LSK 979
कप्-प्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
उरःप्रभृतिभ्यः कप्
Aṣṭādhyāyī 5.4.151
Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

९७९- उरः प्रभृतिभ्यः कप्। उरः प्रभृतिः (आदिः) येषां ते उरःप्रभृतयः, तेभ्यः। उरःप्रभृतिभ्यः पञ्चम्यन्तं, कप् प्रथमान्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। बहुव्रीहौ सक्थ्यक्षणोः स्वाङ्गात् षच् से विभक्तिविपरिणाम करके बहुव्रीहेः की अनुवृत्ति आती है। प्रत्ययः, परश्च, तद्धिताः, समासान्ताः का अधिकार आ रहा है। उरःप्रभृत्यन्ताद् बहुव्रीहेः कप् स्यात् समासान्तः।

उरस् आदि जिसके अन्त में हो ऐसे बहुव्रीहिसमास से समासान्त कप् प्रत्यय होता है।

पकार ही इत्संज्ञक है। क शेष रहता है। लशक्वतद्धिते में अतद्धिते कहा गया है। अतः तद्धित के ककार की इत्संज्ञा नहीं होती है। उरःप्रभृति में उरस्, सर्पिस्, उपानह्, पुमान्, अनड्वान्, पयः, नौ, लक्ष्मी, दधि, मधु, शालि आदि शब्द पढ़े गये हैं।