Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 41
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VṛttiGovind
LSK 981
षकारादेश-सकारादेशार्थं विधिसूत्रम्
कस्कादिषु च
Aṣṭādhyāyī 8.3.48
Vṛtti Varadarājācārya

एष्विण उत्तरस्य विसर्गस्य षोऽन्यस्य तु सः। इति सः। व्यूढोरस्कः।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

९८१- कस्कादिषु च। कस्कः आदिर्येषां ते कस्कादयस्तेषु। इणः षः इस पूरे सूत्र एवं विसर्जनीयस्य सः से विसर्जनीयस्य की, सोऽपदादौ से सः की, कुष्वो \sim क \sim पौ च से कुष्वोः एवं तयोर्व्यावचि संहितायाम् से संहितायाम् की अनुवृत्ति आती है।

कस्क आदि गणपठित शब्दों में इण् प्रत्याहार से परे विसर्ग को षकार आदेश होता है अन्यत्र सकार आदेश होता है।

विशेषः- यह सूत्र दो कार्य करता है- सकार आदेश और षकार आदेश। जहाँ विसर्ग से पूर्व में इण् प्रत्याहारस्थ वर्ण हैं, वहाँ मूर्धन्य षकार और जहाँ इण् नहीं हैं वहाँ दन्त्य सकार आदेश करता है।

व्यूढोरस्कः। चौड़ी छाती वाला पुरुष। व्यूढम् उरो यस्य( पुरुषस्य ) लौकिक विग्रह और व्यूढ सु+उरस् सु अलौकिक विग्रह में अनेकमन्यपदार्थों से समास हुआ। प्रातिपदिकसंज्ञा हुई और सुपो धातुप्रातिपदिकयोः से दोनों सु का लोप करके व्यूढ+उरस् बना। आद्गुणः से गुण होकर व्यूढोरस् बना। उरःप्रभृतिभ्यः कप् से समासान्त कप् प्रत्यय हुआ- व्यूढोरस्+क बना। अब सकार को ससजुषोः रुः से रुत्व होकर खरवसानयोर्विसर्जनीयः से विसर्ग हुआ। व्यूढोरःक बना। विसर्ग के स्थान पर कुष्वो \sim क \sim पौ च से जिह्वामूलीय विसर्ग प्राप्त था, उसे बाध कर कस्कादिषु च की सहायता से सोऽपदादौ से सकार आदेश हुआ- व्यूढोरस्+क ही बना। वर्णसम्मेलन होकर व्यूढोरस्क बना। अब एकदेशविकृतन्यायेन प्रातिपदिक मानकर सु विभक्ति, रुत्वविसर्ग करके व्यूढोरस्कः सिद्ध हुआ।