Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 41
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VṛttiGovind
LSK 978
निपातनार्थ सूत्रम्
सुहृद्दुर्हृदौ मित्रामित्रयोः
Aṣṭādhyāyī 5.4.150
Vṛtti Varadarājācārya

सुदुर्भ्यां हृदयस्य हृद्भावो निपात्यते। सुहृन्मित्रम्। दुर्हृदमित्रः।

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

१७८- सुहृद्दुर्हृदौ मित्रामित्रयोः। सुहृच्च दुर्हृच्च तयोरितरेतरद्वन्द्वः सुहृद्दुर्हृदौ, मित्रञ्च अमित्रश्च तयोरितरेतरयोगद्वन्द्वो मित्रामित्रौ, तयोः। सुहृद्दुर्हृदौ प्रथमान्तं, मित्रामित्रयोः सप्तम्यन्तं, द्विपदं सूत्रम्। बहुव्रीहौ सवश्यक्षणोः स्वाङ्गात् षच् से बहुव्रीहौ की अनुवृत्ति आती है और समासान्ताः का अधिकार है।

क्रमशः मित्र और शत्रु अर्थों में बहुव्रीहि समास में सु और दुर् इन उपसर्गों से परे हृदय शब्द के स्थान पर हृद् आदेश का निपातन किया जाता है।

आचार्य ने हृद् आदेश करने के बाद जो रूप सिद्ध होता है, उस रूप को सूत्र में ही पढ़ दिया है। अतः यह निपातन है।

सुहृत्। (सुहृन्मित्रम्) शोभन हृदय वाला, मित्र। सु शोभनं हृदयं यस्य लौकिक विग्रह और सु+हृदय सु अलौकिक विग्रह है। अनेकमन्यपदार्थों से समास होकर प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके सुहृदय बना। सुहृद्दुर्हृदौ मित्रामित्रयोः से हृदय के स्थान पर हृद् आदेश का निपातन करके सुहृद् बना। इस प्रातिपदिक से सु, उसका हल्द्वादिलोप करके विकल्प से दकार को चर्त्व करने पर सुहृत्, सुहृद् बनते हैं। आगे सुहृदौ, सुहृदः आदि बनाने में कोई परेशानी नहीं है। सुहृत्+मित्रम् में तकार को यरोऽनुनासिकेऽनुनासिको वा से अनुनासिक होकर सुहृन्मित्रम् बन जाता है।

दुर्हृत्। (दुर्हृदमित्रः) दुष्ट हृदय वाला, शत्रु। दुर् दुष्टं हृदयं यस्य लौकिक विग्रह और दुर्+हृदय सु अलौकिक विग्रह है। अनेकमन्यपदार्थे से समास होकर प्रादिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके दुर्हृदय बना। सुहृददुर्हृदौ मित्रामित्रयोः से हृदय के स्थान पर हृद् आदेश का निपातन करके दुर्हृद् बना। रेफ का ऊर्ध्वगमन हुआ- दुर्हृद् इस प्रातिपदिक से सु, उसका हल्ड्यादिलोप करके विकल्प से दकार को चर्त्व करने पर दुर्हृत्, दुर्हृद् बनते हैं। आगे दुर्हृदौ, दुर्हृदः आदि बनाने में कोई परेशानी नहीं है।