पादस्य लोपः स्यात् समासान्तो बहुव्रीहौ। द्विपात्। सुपात्।
.....
१७५- सङ्ख्यासुपूर्वस्य। सङ्ख्या च सुश्च तयोरितरेतरद्वन्द्वः सङ्ख्यासु, सङ्ख्यासू पूर्वो यस्य स
सङ्ख्यासुपूर्वः, तस्य। सङ्ख्यासुपूर्वस्य षष्ठ्यन्तम् एकपदं सूत्रम्। पादस्य लोपोऽहस्त्यादिभ्यः से लोपः और बहुव्रीहौ सक्थ्यक्षणोः स्वाङ्गात् षच् से बहुव्रीहौ की अनुवृत्ति आती है।
सङ्ख्यावाचक शब्द पूर्वक और सु अव्यय पूर्वक पाद शब्द का समासान्त लोप होता है बहुव्रीहि समास में।
यहाँ पर भी अलोऽन्त्यस्य की सहायता से पाद में अन्त्य वर्ण अकार का ही लोप होता है।
द्विपात्। दो पैरों वाला। द्वौ पादौ यस्य सः लौकिक विग्रह और द्वि औ+पाद औ अलौकिक विग्रह में अनेकमन्यपदार्थ से समास होकर प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करने के बाद द्विपाद बना। सङ्ख्यासुपूर्वस्य से अलोऽन्त्यस्य की सहायता से पाद के अकार का समासान्त लोप करके द्विपाद बना। इससे सु आदि विभक्तियाँ आती हैं और वैकल्पिक चर्त्व होकर द्विपात्-द्विपाद, द्विपादौ, द्विपादः आदि रूप सिद्ध हो जाते हैं।
सुपात्। सुन्दर पैरों वाला। सु शोभनौ पादौ यस्य सः लौकिक विग्रह और सु+पाद औ अलौकिक विग्रह में अनेकमन्यपदार्थ से समास होकर प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करने के बाद द्विपाद बना। सङ्ख्यासुपूर्वस्य से अलोऽन्त्यस्य की सहायता से समासान्त पाद के अकार का लोप करके सुपाद बना। इससे सु आदि विभक्तियाँ आती हैं और वैकल्पिक चर्त्व होकर सुपात्-सुपाद, सुपादौ, सुपादः आदि रूप सिद्ध हो जाते हैं। ९७६- उद्विभ्यां काकुदस्य। उत् च विश्च तयोरितरेतरयोगद्वन्द्वः- उद्वी, ताभ्याम्। उद्विभ्यां पञ्चम्यन्तं, काकुदस्य षष्ठ्यन्तं, द्विपदं सूत्रम्। ककुदस्यावस्थायां लोपः से लोपः और बहुव्रीहौ सक्थ्यक्षणोः स्वाङ्गात् षच् से बहुव्रीहौ की अनुवृत्ति आती है। समासान्ताः का अधिकार है।