लोपः स्यात्। उत्काकुत्। विकाकुत्।
.....
उद् और वि इन उपसर्गों से परे काकुद शब्द का समासान्त लोप होता है बहुव्रीहि समास में।
यहाँ पर भी अलोऽन्त्यस्य की सहायता से अन्त्य वर्ण काकुद के अकार का ही लोप होता है।
उत्काकुत्। उठे हुए तालु वाला। उद्गतं काकुदं यस्य सः लौकिक विग्रह और उत्+काकुद सु अलौकिक विग्रह में अनेकमन्यपदार्थ से समास होकर प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करने के बाद उत्काकुद बना। उद्विभ्यां काकुदस्य के द्वारा अलोऽन्त्यस्य की सहायता से समासान्त काकुद के अकार का लोप करके उत्काकुद बना। इससे सु आदि विभक्तियाँ आती हैं और वैकल्पिक चर्त्व होकर उत्काकुत्-उत्काकुद, उत्काकुदौ, उत्काकुदः आदि रूप सिद्ध हो जाते हैं।
विकाकुत्। विकृतं तालु वाला। विकृतं काकुदं यस्य सः लौकिक विग्रह और वि+काकुद सु अलौकिक विग्रह में अनेकमन्यपदार्थ से समास होकर प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करने के बाद विकाकुद बना। उद्विभ्यां काकुदस्य के द्वारा अलोऽन्त्यस्य की
सहायता से समासान्त काकुद के अकार का लोप करके विकाकुद बना। इससे सु आदि विभक्तियाँ आती हैं और वैकल्पिक चर्त्व होकर विकाकुत्-विकाकुद, विकाकुदौ, विकाकुदः आदि रूप सिद्ध हो जाते हैं।