हस्त्यादिवर्जितादुपमानात् परस्य पादशब्दस्य लोपो स्याद् बहुव्रीहौ।
व्याघ्रस्येव पादावस्य व्याघ्रपात्। अहस्त्यादिभ्यः किम्? हस्तिपादः।
कुसूलपादः।
१७४- पादस्य लोपोऽहस्त्यादिभ्यः। हस्ती आदिर्येषां ते हस्त्यादयः, न हस्त्यादयः
अहस्त्यादयस्तेभ्यः। पादस्य पष्ठ्यन्तं, लोपः प्रथमान्तम्, अहस्त्यादिभ्यः पञ्चम्यन्तं, त्रिपदं
सूत्रम्। उपमानाच्च से उपमानात् और बहुव्रीहौ सव्यथक्ष्णोः स्वाङ्गात् षच् से बहुव्रीहौ
को अनुवृत्ति आती है।
हस्ती आदि शब्दों से भिन्न उपमानवाचक शब्द से परे पाद शब्द का
समासान्त लोप होता है बहुव्रीहि समास में।
अलोऽन्त्यस्य परिभाषा के द्वारा पाद के अन्त्य वर्ण अकार का ही लोप हो पाता है।
विशेषः- यद्यपि लोप अभावरूप है तथापि स्थानी के द्वारा समासान्त माना जाता है।
यदि इसे समासान्त न कहा जाय तो उपमानात् इस पञ्चम्यन्त से परे पाद-शब्द के लोप-विध
ान होने से आदेः परस्य की सहायता से पाद के आदि वर्ण पकार का लोप होने लगेगा और
बहुव्रीहि समास में अन्य समासान्त न हुआ हो तो शेषाद्विभाषा से सामान्यतः विकल्प से कपू होने
लगेगा जिससे अनिष्ट रूप सिद्ध होगा। लोप को समासान्त मानने पर ये दोष नहीं आयेंगे।
व्याघ्रपात्। बाघ के पैरों की तरह पैर वाला। व्याघ्रपादौ इव पादौ यस्य सः
लौकिक विग्रह और व्याघ्रपाद औ+पाद औ अलौकिक विग्रह में अनेकमन्यपदार्थों के
अन्तर्गत सप्तम्युपमानपूर्वपदस्योत्तरपदलोपश्च इस वार्तिक से समास और पूर्वपद के
उत्तरपद पाद का लोप करके प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करने के बाद व्याघ्रपाद बना।
पादस्य लोपोऽहस्त्यादिभ्यः से अलोऽन्त्यस्य की सहायता से पाद के अकार का समासान्त
लोप करके व्याघ्रपाद बना। इससे सु आदि विभक्तियाँ आती हैं और वैकल्पिक चर्त्व होकर
व्याघ्रपात्-व्याघ्रपाद, व्याघ्रपादौ, व्याघ्रपादः आदि रूप सिद्ध हो जाते हैं।
अहस्त्यादिभ्यः किम्? हस्तिपादः, कुसूलपादः। यदि पादस्य लोपोऽहस्त्यादिभ्यः
इस सूत्र में अहस्त्यादिभ्यः न कहते तो हस्तिपाद, कुसूलपाद आदि शब्दों में भी पाद के
अकार का लोप होने लगता, जिससे हस्तिपात्, कुसूलपात् ऐसे अनिष्ट रूप बनने लगते।