Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 41
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VṛttiGovind
LSK 972
ष-प्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
द्वित्रिभ्यां ष मूर्ध्नः
Aṣṭādhyāyī 5.4.115
Vṛtti Varadarājācārya

आभ्यां मूर्ध्नः षः स्याद् बहुव्रीहौ। द्विमूर्धः। त्रिमूर्धः।

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

१७२- द्वित्रिभ्यां ष मूर्ध्नः। द्विश्च त्रिश्च तयोरितरेतरद्वन्द्वो द्वित्री, ताभ्याम्। द्वित्रिभ्यां पञ्चम्यन्तं, षः लुप्तप्रथमाकं, मूर्ध्नः षष्ठ्यन्तं, त्रिपदं सूत्रम्। बहुव्रीहौ सक्थ्यक्षणोः स्वाङ्गात् षच् से बहुव्रीहौ की अनुवृत्ति आती है। प्रत्ययः, परश्च, तद्धिताः, समासान्ताः ये सब अधिकृत हैं।

बहुव्रीहि समास में द्वि और त्रि शब्दों से परे यदि मूर्धन् शब्द हो तो उससे समासान्त ष प्रत्यय होता है।

षकार इत्संज्ञक है, अकार बचता है। षित् का प्रयोजन पूर्ववत् डीष्विधान ही है।

द्विमूर्धः। दो सिर हैं जिसके वह पुरुष। द्वौ मूर्धानौ यस्य सः लौकिक विग्रह और द्वि औ+मूर्धन् औ अलौकिक विग्रह में अनेकमन्यपदार्थे से समास आदि सभी कार्य करने के बाद द्विमूर्धन् बना। द्वित्रिभ्यां ष मूर्धः से समासान्त षच् प्रत्यय करके द्विमूर्धन्+अ बना। नस्तद्धिते से टिसंज्ञक अन् का लोप करके द्विमूर्ध+अ= द्विमूर्ध ऐसा अकारान्त शब्द बना। सु आदि प्रत्यय करके राम शब्द की तरह रूप बनते हैं- द्विमूर्धः, द्विमूर्धौ, द्विमूर्धाः आदि। स्त्रीत्व-विवक्षा में षित्वात् षिद्गौरादिभ्यश्च से डीष् होकर द्विमूर्धी, द्विमूर्ध्यौ, द्विमूर्ध्यः आदि बनते हैं।

त्रिमूर्धः। तीन सिर हैं जिसके वह पुरुष। त्रयो मूर्धानो यस्य सः लौकिक विग्रह और त्रि जस्+मूर्धन् जस् अलौकिक विग्रह में अनेकमन्यपदार्थे से समास आदि सभी कार्य करने के बाद त्रिमूर्धन् बना। द्वित्रिभ्यां ष मूर्धः से समासान्त षच् प्रत्यय करके त्रिमूर्धन्+अ बना। नस्तद्धिते से टिसंज्ञक अन् का लोप करके त्रिमूर्ध+अ= त्रिमूर्ध ऐसा अकारान्त शब्द बना। सु आदि प्रत्यय करके राम शब्द की तरह रूप बनते हैं- त्रिमूर्धः, त्रिमूर्धौ, त्रिमूर्धाः आदि। स्त्रीत्व-विवक्षा में षित्वात् षिद्गौरादिभ्यश्च से डीष् होकर त्रिमूर्धी, त्रिमूर्ध्यौ, त्रिमूर्ध्यः आदि बनते हैं। स्मरण रहे कि केवल मूर्धन् शब्द के पुँल्लिङ्ग में मूर्धा, मूर्धानौ, मूर्धानः आदि रूप बनते हैं।