स्वाङ्गावाचिसक्थ्यक्षणाद् बहुव्रीहेः षच् स्यात्। दीर्घसक्थः। जलजाक्षी।
स्वाङ्गात् किम्? दीर्घसक्थि शकटम्। स्थूलाक्षा वेणुयष्टिः।
अक्षणोऽदर्शनादिति वक्ष्यमाणोऽच्।
९७१- बहुव्रीहौ सक्थ्यक्षणोः स्वाङ्गात् षच्। सक्थि च अक्षि च तयोरितरेतरद्वन्द्वः सक्थ्यक्षिणी, तयोः सक्थ्यक्षणोः। बहुव्रीहौ सप्तम्यन्तं, सक्थ्यणोः षष्ठ्यन्तं, स्वाङ्गात् पञ्चम्यन्तं, षच् प्रथमान्तम् अनेकपदं सूत्रम्। प्रत्ययः, परश्च, तद्धिताः, समासान्ताः का अधिकार आ रहा है।
स्वाङ्गावाची सक्थि या अक्षि शब्द जिसके अन्त में हो, ऐसे बहुव्रीहि से समासान्त षच् प्रत्यय होता है।
षकार का षः प्रत्ययस्य से और चकार का हलन्त्यम् से इत्संज्ञा हो जाने के बाद लोप जाता है। षकार की इत्संज्ञा होने से शब्द षित् हो जाता है। षित् का फल स्त्रीलिङ्ग में षित् को आधार बनाकर षिद्गौरादिभ्यश्च से डीष् प्रत्यय होना है। चित् का फल स्वरप्रकरण में अन्तोदात्त है। इस सूत्र में आया हुआ स्वाङ्ग शब्द पारिभाषिक है जिसे स्वाङ्गाच्चोपसर्जनादसंयोगोपधात् इस सूत्र की व्याख्या में बताया जायेगा। सामान्यतः समझना चाहिए कि अस्थि और अक्षि शब्द शरीर के अंगवाची ही हों, अन्य के वाचक न हों।
दीर्घसक्थः। दीर्घ ऊरुओं वाला पुरुष। दीर्घे सक्थिनी स्तः यस्य(पुरुषस्य) लौकिक विग्रह और दीर्घ औ+सक्थि औ अलौकिक विग्रह में अनेकमन्यपदार्थे से समास हुआ। प्रातिपदिकसंज्ञा हुई और सुपो धातुप्रातिपदिकयोः से दोनों औ का लोप करके दीर्घ+सक्थि बना। सक्थि शरीर का अंग है। अतः बहुव्रीहौ सक्थ्यक्षणोः स्वाङ्गात् षच् से समासान्त षच् प्रत्यय हुआ। षकार की षः प्रत्ययस्य से इत्संज्ञा और चकार की हलन्त्यम् से इत्संज्ञा होकर लोप हो जाने पर अ बचा। यस्येति च से सक्थि के इकार के लोप हो जाने के बाद दीर्घसक्थ्+अ बना। वर्णसम्मेलन होकर दीर्घसक्थि बना। दीर्घ और सक्थि दोनों शब्द नपुंसकलिङ्ग के थे किन्तु समास करने से समासशक्ति के बल पर समस्त शब्द पुँल्लिङ्ग में बदल गया। अब एकदेशविकृतन्यायेन प्रातिपदिक मानकर सु विभक्ति, रुत्वविसर्ग करके दीर्घसक्थः सिद्ध हुआ।
जलजाक्षी। कमल की तरह सुन्दर आँख वाली स्त्री। जलजे इव अक्षिणी यस्याः लौकिक विग्रह और जलजा औ+अक्षि औ अलौकिक विग्रह में अनेकमन्यपदार्थे से उसी तरह समास आदि सभी कार्य करने के बाद बहुव्रीहौ सक्थ्यक्षणोः स्वाङ्गात् षच् से षच् करके यस्येति च से अक्षि के इकार का लोप करके जलजाक्ष शब्द बन जाता है। इससे स्त्रीत्व की विवक्षा में षिदन्त मानकर षिद्गौरादिभ्यश्च से डीष् प्रत्यय, अनुबन्ध लोप, पुनः यस्येति च से जलजाक्ष के अन्त्य अकार को लोप करके जलजाक्षी बनता है। प्रातिपदिक मानकर सु, उसका हल्ड्याब्भ्यो दीर्घात्सुतिस्यपृक्तं हल् से लोप करके गौरी की तरह जलजाक्षी बन जाता है।
स्वाङ्गात् किम्? दीर्घसक्थि शकटम्। स्थूलाक्षा वेणुयष्टिः। यदि बहुव्रीहौ सक्थ्यक्षणोः स्वाङ्गात् षच् में स्वाङ्गात् न कहते तो दीर्घसक्थि शकटम् (लम्बे फड़ वाली गाड़ी, छकड़ा) और स्थूलाक्षा वेणुयष्टिः(मोटी ग्रन्थियों वाली बाँस की छड़ी) यहाँ पर भी षच् होता और दीर्घसक्थम् ऐसा अनिष्ट रूप बन जाता। स्थूलाक्षा यह वेणुयष्टिः का विशेषण है। अतः स्त्रीत्व की विवक्षा में षित्त्वात् षिद्गौरादिभ्यः से डीष् होकर के स्थूलाक्षी ऐसा अनिष्ट रूप बनता। अतः उक्त सूत्र में स्वाङ्गात् कहना पड़ा। अतः षच् नहीं हुआ फलतः डीष् भी नहीं हुआ किन्तु स्थूलाक्षा में अक्षणोऽदर्शनात् सूत्र से अ प्रत्यय होकर अजाद्यतष्टाप् से टाप् होता है।