Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 41
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VṛttiGovind
LSK 970
अप्-प्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
अप् पूरणीप्रमाण्योः
Aṣṭādhyāyī 5.4.116
Vṛtti Varadarājācārya

पूरणार्थप्रत्ययान्तं यत् स्त्रीलिङ्गं, तदन्तात् प्रमाण्यन्ताच्च बहुव्रीहेरप् स्यात्।

कल्याणी पञ्चमी यासां रात्रीणां ता कल्याणीपञ्चमा रात्रयः। स्त्री प्रमाणी यस्य स्य स्त्रीप्रमाणः। अप्रियादिषु किम्? कल्याणीप्रिय इत्यादि।

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

९७०- अप् पूरणीप्रमाण्योः। पूरणी च प्रमाणी च तयोरितरेतरद्वन्द्वः पूरणीप्रमाण्यौ, तयोः। अप् प्रथमान्त, पूरणीप्रमाण्योः षष्ठ्यन्तं, द्विपदं सूत्रम्। बहुव्रीहौ सक्थ्यक्षणोः स्वाङ्गात् षच् से बहुव्रीहौ की अनुवृत्ति आती है।

पूरणार्थप्रत्ययान्त जो स्त्रीलिङ्ग, तदन्त बहुव्रीहि से तथा प्रमाणीशब्दान्त बहुव्रीहि से समासान्त अप् प्रत्यय होता है।

एकस्य पूरणः प्रथमः, द्वयोः पूरणो द्वितीयः, त्रयाणां पूरणः तृतीयः, चतुर्णां पूरणश्चतुर्थः। संख्यावाचक शब्दों से तद्धित पूरणार्थक प्रत्यय होकर जैसे हिन्दी में भी एक से पहला, दो से दूसरा, तीन से तीसरा आदि के रूप में प्रयुक्त होते हैं, उसी तरह संस्कृत में भी पूरणप्रत्यान्त प्रथमः, द्वितीयः, तृतीयः, चतुर्थः, पञ्चमः आदि शब्द बनते हैं। ऐसे शब्दों के साथ में समास होने पर पुंवद्भाष न होकर समासान्त अप् प्रत्यय इस सूत्र के द्वारा किया जाता है।

कल्याणीपञ्चमा रात्रयः। जिन रातों में पांचवीं रात कल्याणदायिनी है, ऐसी सभी रातें। कल्याणी पञ्चमी यासां रात्रीणाम् लौकिक विग्रह और कल्याणी सु पञ्चमी सु अलौकिक विग्रह है। यहाँ पर पञ्चन् इस संख्यावाचक शब्द से पूरणार्थक प्रत्यय होकर स्त्रीलिङ्ग में पञ्चमी बना है। अनेकमन्यपदार्थों से समास होकर, सुप् के लुक् होने के बाद कल्याणी पञ्चमी हुआ है। यहाँ पर समानाधिकरण स्त्रीलिङ्ग के उत्तरपद परे होने पर भी अपूरणीप्रियादिषु से निषेध होने के कारण स्त्रियाः पुंवद्भाषितपुंस्कादनूड् समानाधिकरणे स्त्रियामपूरणीप्रियादिषु से पुंवद्भाष नहीं हुआ किन्तु अप् पूरणीप्रमाण्योः से समासान्त

अप् प्रत्यय होकर कल्याणीपञ्चमी अ बना। यस्येति च से ईकार का लोप, वर्णसम्मेलन होकर कल्याणीपञ्चम बना। अब अजाद्यतष्टाप् से टाप्, अनुबन्धलोप, दीर्घ होकर कल्याणीपञ्चमा बना। जस् विभक्ति का रूप कल्याणीपञ्चमाः सिद्ध हुआ।

स्त्रीप्रमाणः। स्त्री जिसके लिए प्रमाण हो, वह पुरुष। स्त्री प्रमाणी यस्य सः लौकिक विग्रह और स्त्री सु प्रमाणी सु अलौकिक विग्रह है। यहाँ पर अनेकमन्यपदार्थे से समास होकर, सुप् के लुक् होने के बाद स्त्रीप्रमाणी बना है। यहाँ पर स्त्री शब्द भाषितपुंस्क नहीं है। अतः पुंवद्भाव प्राप्त नहीं है। अप् करने वाले सूत्र ने प्रमाणी शब्द के परे भी अप् प्रत्यय किया है। अतः उसी का उदाहरण है। अतः अप् पूरणीप्रमाणयोः से समासान्त अच् प्रत्यय होकर स्त्रीप्रमाणी अ बना। यस्येति च से ईकार का लोप, वर्णसम्मेलन होकर स्त्रीप्रमाण बना। सु विभक्ति का रूप स्त्रीप्रमाणः (पुरुषः) सिद्ध हुआ।

अप्रियादिषु किम्? कल्याणीप्रियः। यह पूर्वसूत्र का प्रत्युदाहरण है। वहाँ पर अपूरणीप्रियादिषु लिखा है। वहाँ पूरणार्थक प्रत्ययान्त शब्द तथा प्रियादि शब्द के परे होने पर पुंवद्भाव का निषेध किया गया है तो प्रियादि के परे होने पर निषेध करने का फल क्या है? उसके उत्तर में कहा गया कल्याणीप्रियः। यदि स्त्रियाः पुंवद्भावितपुंस्कादनूड् समानाधिकरणे स्त्रियामपूरणीप्रियादिषु में अप्रियादिषु यह नहीं कहते तो प्रिय आदि के परे होने पर भी पूर्व में विद्यमान स्त्रीलिङ्गी शब्द में पुंवद्भाव होकर कल्याणप्रियः ऐसा अनिष्ट रूप बन जाता। क्योंकि उस सूत्र के प्रवृत्त होने में अन्य जो निमित्त आवश्यक हैं, वे सब यहाँ पर मिलते हैं।