Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 41
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VṛttiGovind
LSK 969
पुंवद्भावविधायकं विधिसूत्रम्
स्त्रियाः पुंवद्भाषितपुंस्कादनूङ् समानाधिकरणे स्त्रियामपूरणीप्रियाऽऽदिषु
Aṣṭādhyāyī 6.3.34
Vṛtti Varadarājācārya

उक्तपुंस्कादनूङ् ऊङोऽभावोऽस्यामिति बहुव्रीहिः। निपातनात् पञ्चम्या

अलुक् षष्ठ्याश्च लुक्। तुल्ये प्रवृत्तिनिमित्ते यदुक्तपुंस्कं तस्मात्पर

ऊङोऽभावो यत्र तथाभूतस्य स्त्रीवाचकशब्दस्य पुंवाचकस्येव रूपं

स्यात् समानाधिकरणे स्त्रीलिङ्गे उत्तरपदे न तु पूरण्यां प्रियादौ च परतः।

गोस्त्रियोरिति ह्रस्वः। चित्रगुः। रूपवद्भार्यः।

अनूङ् किम्? वामोरूभार्यः। पूरण्यां तु-

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

१६९- स्त्रियाः पुंवद्भाषितपुंस्कादनूङ् समानाधिकरणे स्त्रियामपूरणीप्रियादिषु। पुंसि इव पुंवत्। भाषितः पुमान् येन स भाषितपुंस्कः, बहुव्रीहिः। तस्मात् भाषितपुंस्काद्। न ऊङ्-ऊङोऽभावः अनूङ्। भाषितपुंस्काद् अनूङ् यस्यां सा भाषितपुंस्कादनूङ्। निपातनात् पञ्चमी की अलुक् और षष्ठी का लुक् हुआ है। अत भाषितपुंस्कादनूङ् यह लुप्तषष्ठीक पद है। स्त्रियाः षष्ठ्यन्तं, पुंवद् अव्ययपदं, भाषितपुंस्कादनूङ् लुप्तषष्ठ्यन्तं, समानाधिकरणे सप्तम्यन्तं, स्त्रियाम् सप्तम्यन्तं, पूरणीप्रियादिषु सप्तम्यन्तम्, अनेकपदमिदं सूत्रम्। इस सूत्र में अलुगुत्तरपदे से उत्तरपदे की अनुवृत्ति आती है। यह सूत्र स्त्रीलिङ्ग को पुँल्लिङ्ग करने का कार्य करता है। इस सूत्र के अर्थ को समझने के लिए पहले शब्दार्थ समझना आवश्यक है।

पुंवत् का अर्थ है- पुँल्लिङ्ग के समान हो जाय अर्थात् पुँल्लिङ्ग की तरह रूप बन जाय।

भाषितपुंस्क क्या है? प्रत्येक शब्द का अपने अर्थ का बोधन कराने के लिए कोई न कोई निमित्त अवश्य ही होता है। उस निमित्त को प्रवृत्तिनिमित्त कहते हैं। जैसे घट शब्द में घड़े को बोध कराने का निमित्त घटत्व है। यदि उसमें घटत्व नहीं मिलता तो उसे कोई घट नहीं कहता अर्थात् जिस विशेषता के कारण कोई शब्द अपने अर्थ को जनाता है, उस शब्द की वह विशेषता ही उसका प्रवृत्तिनिमित्त होता है। जो शब्द जिस प्रवृत्तिनिमित्त को लेकर पुँल्लिङ्ग में प्रवृत्त होता है वह उसी प्रवृत्तिनिमित्त को लेकर अन्य लिङ्ग में भी प्रवृत्त हो तो उसे भाषितपुंस्क कहते हैं।

अनूङ्- ऐसे भाषितपुंस्क शब्द से परे ऊङ्-प्रत्यय न हुआ हो।

पूरणीप्रियादि- मट्, डट् आदि पूरणार्थक प्रत्यय हैं और प्रिय आदि शब्द हैं।

सूत्रार्थ- प्रवृत्तिनिमित्त समान होते हुए जो उक्तपुंस्क शब्द उससे परे ऊङ् प्रत्यय जहाँ न किया गया हो ऐसे स्त्रीवाचक शब्द का पुंवाचक शब्द के समान रूप होता है, समान विभक्तिक स्त्रीलिंगशब्द उत्तरपद परे होने पर, किन्तु पूरणार्थक प्रत्ययान्त शब्दों तथा प्रिया आदि शब्दों के परे रहते नहीं होता।

इस तरह यह सूत्र पुंवद्भाव करता है।

चित्रगुः। चित्र वर्ण वाली गौओं वाला व्यक्ति। चित्राः गावः यस्य लौकिक विग्रह और चित्रा जस्+गो जस् अलौकिक विग्रह में अनेकमन्यपदार्थों से समास हुआ। प्रातिपदिकसंज्ञा हुई और सुपो धातुप्रातिपदिकयोः से दोनों जसों का लोप करके चित्रा+गो बना। गायों का वाचक गो-शब्द स्त्रीलिङ्ग है और चित्रा भी स्त्रीलिङ्ग है, दोनों में समान ही विभक्ति लगी थी, इसलिए समानविभक्तिक भी हैं। ऊङ्-प्रत्यय हुआ नहीं है और पूरणी अर्थ के वाचक प्रत्यय वाले शब्द और प्रियादि शब्द भी परे नहीं हैं। चित्रा शब्द पुँल्लिङ्ग में भी बनता है, जैसे चित्रः, चित्रौ आदि। इसलिए भाषिकपुंस्क है। अतः स्त्रियाः पुंवद्भाषितपुंस्कादनूङ् समानाधिकरणे स्त्रियामपूरणीप्रियादिषु से गो शब्द के परे होने पर चित्रा को पुंवत् (पुंवद्भाव) हुआ अर्थात् पुँल्लिङ्ग की तरह चित्र के रूप में परिवर्तन हुआ। चित्रः+गो बना। इसके बाद गोस्त्रियोरुपसर्जनस्य से गो के ओकार को ह्रस्व हो गया। स्मरण रहे कि ओकार को ह्रस्व उकार होता है। अतः गो से गु बना। चित्रगु बन गया। चित्रा और गो दोनों शब्द स्त्रीलिङ्ग के थे किन्तु समास करने से समासशक्ति के बल पर समस्त शब्द पुँल्लिङ्ग में बदल गया। अब एकदेशविकृतन्यायेन प्रातिपदिक मानकर सु विभक्ति, रुत्वविसर्ग करके चित्रगुः सिद्ध हुआ।

रूपवद्भार्यः। रूपवती स्त्री वाला पुरुष। रूपवती भार्या अस्ति यस्य लौकिक विग्रह और रूपवती सु+भार्या सु अलौकिक विग्रह में अनेकमन्यपदार्थ से समास हुआ। प्रातिपदिकसंज्ञा हुई और सुपो धातुप्रातिपदिकयोः से दोनों सु का लोप करके रूपवती+भार्या बना। रूपवती स्त्रीलिङ्ग है और भार्या भी स्त्रीलिङ्ग है, दोनों में समान ही विभक्ति लगी थी, इसलिए समानविभक्तिक भी हैं। ऊङ्-प्रत्यय नहीं हुआ है और पूरणी और प्रियादि भी परे नहीं हैं। रूपवती यह शब्द पुँल्लिङ्ग में रूपवान् ऐसा बनता है, इसलिए भाषिकपुंस्क भी है। अतः स्त्रियाः पुंवद्भाषितपुंस्कादनूङ् समानाधिकरणे स्त्रियामपूरणीप्रियादिषु से भार्या शब्द के परे होने पर रूपवती को पुंवत् (पुंवद्भाव) हुआ। अतः पुँल्लिङ्ग की तरह रूपवत् हुआ। रूपवत्+भार्या बना। भार्या के भकार के परे होने पर झलां जशोऽन्ते से जश्त्व होकर दकार बन गया, रूपवद्+भार्या बना, वर्णसम्मेलन हुआ- रूपवद्भार्या बना। इसके बाद गोस्त्रियोरुपसर्जनस्य से भार्या में जो स्त्रीप्रत्यय टाप् वाला आकार है, उसको ह्रस्व हो गया- रूपवद्भार्या बना। रूपवती और भार्या दोनों शब्द स्त्रीलिङ्ग के थे किन्तु समास करने से समासशक्ति के बल पर समस्त शब्द पुँल्लिङ्ग में बदल गया। रूपवती भार्या है जिस पुरुष की, वह पुरुष। अब एकदेशविकृतन्यायेन प्रातिपदिक मानकर सु विभक्ति, रुत्वविसर्ग करके रूपवद्भार्यः सिद्ध हुआ।

अन्य उदाहरण देखें-

दीर्घजङ्घः। लम्बी जांघ वाला पुरुष। दीर्घे जङ्घे स्तः यस्य (पुरुषस्य) लौकिक विग्रह और दीर्घा औ+ जङ्घा औ अलौकिक विग्रह में अनेकमन्यपदार्थ से समास हुआ। प्रातिपदिकसंज्ञा हुई और सुपो धातुप्रातिपदिकयोः से दोनों औ का लोप करके दीर्घा+जङ्घा बना। दीर्घा स्त्रीलिङ्ग है और जङ्घा भी स्त्रीलिङ्ग है, दोनों में समान ही विभक्ति लगी थी, इसलिए समानविभक्तिक भी हैं। ऊङ्-प्रत्यय नहीं हुआ है और पूरणी और प्रियादि भी परे नहीं हैं। दीर्घा यह शब्द पुँल्लिङ्ग में दीर्घः बन चुका है, इसलिए भाषितपुंस्क है। अतः स्त्रियाः पुंवद्भाषितपुंस्कादनूङ् समानाधिकरणे स्त्रियामपूरणीप्रियादिषु से जङ्घा शब्द के परे होने पर दीर्घा को पुंवत् (पुंवद्भाव) हुआ अर्थात् पुँल्लिङ्ग की तरह दीर्घ के रूप में परिवर्तित हुआ, दीर्घा+जङ्घा बना। इसके बाद गोस्त्रियोरुपसर्जनस्य से जङ्घा में जो स्त्रीप्रत्यय टाप् वाला आकार है, उसको ह्रस्व हो गया- दीर्घजङ्घ बना। दीर्घा और जङ्घा दोनों शब्द स्त्रीलिङ्ग के थे किन्तु समास करने से समासशक्ति के बल पर समस्त शब्द पुँल्लिङ्ग में बदल गया। लम्बी जांघाएँ हैं जिस पुरुष की, वह पुरुष। अब एकदेशविकृतन्यायेन प्रातिपदिक मानकर सु विभक्ति, रुत्वविसर्ग करके दीर्घजङ्घः सिद्ध हुआ।

सुन्दरभार्यः। सुन्दरी स्त्री वाला पुरुष। सुन्दरी भार्या अस्ति यस्य लौकिक विग्रह और सुन्दरी सु+भार्या सु अलौकिक विग्रह में अनेकमन्यपदार्थ से समास हुआ। प्रातिपदिकसंज्ञा हुई और सुपो धातुप्रातिपदिकयोः से दोनों सु का लोप करके सुन्दरी+भार्या बना। सुन्दरी स्त्रीलिङ्ग है और भार्या भी स्त्रीलिङ्ग है, दोनों में समान ही विभक्ति लगी थी इसलिए समानविभक्तिक भी हैं। ऊङ्-प्रत्यय नहीं हुआ है और पूरणी और प्रियादि परे भी नहीं हैं। सुन्दरी यह शब्द पुँल्लिङ्ग में सुन्दरः बनता है इसलिए भाषिकपुंस्क है। अतः स्त्रियाः पुंवद्भाषितपुंस्कादनूङ् समानाधिकरणे स्त्रियामपूरणीप्रियादिषु से भार्या शब्द के परे होने पर सुन्दरी को पुंवत् (पुंवद्भाव) हुआ। पुँल्लिङ्ग की तरह सुन्दर होकर सुन्दर+भार्या बना। इसके बाद गोस्त्रियोरुपसर्जनस्य से भार्या में जो स्त्रीप्रत्यय टाप् वाला आकार है, उसको

ह्रस्व हो गया- सुन्दरभार्य बना। सुन्दरी और भार्या दोनों शब्द स्त्रीलिङ्ग के थे किन्तु समास करने से समासशक्ति के बल पर समस्त शब्द पुँल्लिङ्ग में बदल गया। सुन्दरी भार्या है जिस पुरुष की, वह पुरुष। अब एकदेशविकृतन्यायेन प्रातिपदिक मानकर सु विभक्ति, रुत्वविसर्ग करके सुन्दरभार्यः सिद्ध हुआ।

अनूड् किम्? वामोरूभार्यः। यदि स्त्रियाः पुंवद्भाषितपुंस्कादनूड् समानाधिकरणे स्त्रियामपूरणीप्रियादिषु में अनूड् न कहते तो क्या होता? उत्तर देते हैं- वामोरूभार्यः। यहाँ वाम शब्द पूर्वक ऊरु शब्द से संहितशफलक्षणवामादेश्च से ऊड् प्रत्यय हुआ है। उसके बाद वामोरूः भार्या यस्य में समास होकर दीर्घ ऊकार वाला वामोरूभार्यः बनता है। इसमें भी उक्त सूत्र से पुंवद्भाष होकर ह्रस्व ऊकार वाला वामोरूभार्यः ऐसा अनिष्ट रूप बनने लगता।

अब पूरणी प्रत्ययान्त समानाधिकरण उत्तर पद के परे रहने पर पुंवद्भाष नहीं होता है तो क्या होता है? इस पर अग्रिम सूत्र का अवतरण करते हैं।