Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 41
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VṛttiGovind
LSK 966
बहुव्रीहि-समासविधायकं विधिसूत्रम्
अनेकमन्यपदार्थे
Aṣṭādhyāyī 2.2.24
Vṛtti Varadarājācārya

अनेकं प्रथमान्तमन्यस्य पदस्यार्थे वर्तमानं वा समस्यते, स बहुव्रीहिः।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

समासप्रकरण में चौथे बहुव्रीहिसमास का आरम्भ करते हैं। इस समास में समास किये जाने वाले पदों से भिन्न अन्यपद का अर्थ प्रधान होता है, अतः इस समास को अन्यपदार्थप्रधान-बहुव्रीहि-समास कहा जाता है। अन्य पद का अर्थ प्रधान होने के कारण ही इस समास का लिङ्ग और वचन भी वही होता है जो अन्य पद का हुआ करता है। अन्यपदार्थप्रधान का उदाहरण देखिये- पीतानि अम्बराणि सन्ति यस्य ऐसे लौकिक विग्रह और पीत जस्+अम्बर जस् ऐसे अलौकिक विग्रह में समास करके पीताम्बर बन जाता है। अब यहाँ न तो पीत का अर्थ प्रधान है और न अम्बर का अर्थ प्रधान है अपितु पीले वस्त्र वाले भगवान् विष्णु यह अर्थ प्रधान हो जाता है। अतः विष्णु इस अन्य पद के लिङ्ग के अनुसार ही समास किये गये पीताम्बर शब्द के लिङ्ग एवं वचन होते हैं। इस समास में समस्यमान पद प्रायः प्रथमान्त ही होते हैं और केवल यं, येन, यस्मै, यस्मात्, यस्य, यस्मिन् आदि लगाकर तत्तद् विभक्तियों का बोध किया जाता है।

९६६- अनेकमन्यपदार्थे। न एकम् अनेकम्। अन्यच्च तत्पदमन्यपदम्, तस्यार्थोऽन्यपदार्थस्तस्मिन्। अनेकं प्रथमान्तम्, अन्यपदार्थ सप्तम्यन्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। इस सूत्र में ऊपर से समासः, विभाषा और बहुव्रीहिः का अधिकार है।

अन्यपद के अर्थ में विद्यमान एक से अधिक प्रथमान्त पद परस्पर में विकल्प से समास को प्राप्त हों और उसे बहुव्रीहि समास कहा जाय।

बहुव्रीहि भी समास की एक संज्ञा है। समास होने के बाद प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक्, सु आदि विभक्ति की उत्पत्ति आदि पूर्ववत् ही होंगे।