समस्येते। अकारश्चानयोरन्तादेशः। प्राप्तो जीविकां प्राप्तजीविकः।
आपन्नजीविकः। अलं कुमार्यै अलंकुमारिः। अत एव ज्ञापकात् समासः।
निष्कौशाम्बिः।
९६३- प्राप्तापन्ने च द्वितीयया। प्राप्तं च आपन्नं च तयोरितरेतरद्वन्द्वः प्राप्तापन्ने। प्राप्तापन्ने प्रथमान्तं, द्वितीयया तृतीयान्तम्, अ लुप्तप्रथमाकं पदं, त्रिपदं सूत्रम्। समासः, सुप्, सह सुपा, तत्पुरुषः ये पहले से अधिकृत हैं।
प्राप्त और आपन्न सुबन्त शब्दों का द्वितीयान्त समर्थ सुबन्त के साथ विकल्प से तत्पुरुष समास होता है और समास के अन्त्य वर्ण के स्थान पर अ आदेश भी होता है।
यह सूत्र द्वितीया श्रितातीतपतितगतात्यस्तप्राप्तापन्नैः का अपवाद है। यदि उस सूत्र से समास होता तो प्राप्त और आपन्न का पूर्वप्रयोग न हो पाता क्योंकि वहाँ पर प्रथमान्त पद द्वितीया है, अतः द्वितीयान्त का ही पूर्वप्रयोग होता किन्तु इससे समास होने पर प्राप्त और आपन्न ही प्रथमानिर्दिष्ट हो जाते हैं। फलतः इनका ही पूर्वप्रयोग हो जायेगा।
प्राप्तजीविकः। जीविका को प्राप्त कर चुका व्यक्ति। प्राप्तः जीविकाम् लौकिक विग्रह और प्राप्त सु जीविका अम् अलौकिक विग्रह है। प्राप्तापन्ने च द्वितीयया से समास, समाससूत्र में प्रथमान्त पद प्राप्तापन्ने है, इससे निर्दिष्ट प्राप्त सु की उपसर्जनसंज्ञा और पूर्वप्रयोग होने पर फिर नियतविभक्ति होने के कारण एकविभक्ति चापूर्वनिपाते से
जीविका अम् की उपसर्जनसंज्ञा, पूर्वनिपात का अभाव, प्रातिपदिकसंज्ञा, विभक्ति का लुक् करके प्राप्तजीविका बना है। उक्त सूत्र से ही समासान्त वर्ण के स्थान पर अ आदेश किया जाता है। अतः आकार के स्थान पर अकार आदेश होकर प्राप्तजीविका बना। यहाँ परवल्लिङ्गं द्वन्द्वतत्पुरुषयोः के अनुसार परवल्लिङ्ग होने पर जीविका शब्द में स्त्रीलिङ्ग होने के कारण प्राप्तजीविका होना चाहिए था किन्तु द्विगुप्राप्तापन्नालंपूर्वगतिसमासेषु प्रतिषेधो वाच्यः से निषेध हो जाने के कारण अपने विशेष्य पद के अनुसार पुँल्लिङ्ग ही हुआ। एकदेशविकृतन्यायेन सु, रुत्वविसर्ग आदि करके प्राप्तजीविकाः सिद्ध हो जाता है।
आपन्नजीविकाः। जीविका को प्राप्त कर चुका व्यक्ति। आपन्नो जीविकाम् लौकिक विग्रह और आपन्न सु जीविका अम् अलौकिक विग्रह है। प्राप्तापन्ने च द्वितीयया से समास, समाससूत्र में प्रथमान्त पद प्राप्तापन्ने है, इससे निर्दिष्ट आपन्न सु की उपसर्जनसंज्ञा और पूर्वप्रयोग होने पर फिर नियतविभक्ति होने के कारण एकविभक्ति चापूर्वनिपाते से जीविका अम् की उपसर्जनसंज्ञा, पूर्वनिपात का अभाव, प्रातिपदिकसंज्ञा, विभक्ति का लुक् करके आपन्नजीविका बना है। उक्त सूत्र से ही समासान्त वर्ण के स्थान पर अ आदेश किया जाता है। अतः आकार के स्थान पर अकार आदेश होकर आपन्नजीविका बना। यहाँ पर भी परवल्लिङ्गं द्वन्द्वतत्पुरुषयोः के अनुसार परवल्लिङ्ग होने पर जीविका शब्द में स्त्रीलिङ्ग होने के कारण प्राप्तजीविका होना चाहिए था किन्तु द्विगुप्राप्तापन्नालंपूर्वगतिसमासेषु प्रतिषेधो वाच्यः से निषेध हो जाने के कारण अपने विशेष्य पद के अनुसार पुँल्लिङ्ग ही हुआ। एकदेशविकृतन्यायेन सु, रुत्वविसर्ग आदि करके आपन्नजीविकाः सिद्ध हो जाता है।
अलङ्कुमारिः। कुमारी के लिए योग्य युवा, वर। अलम् कुमार्यै लौकिक विग्रह और अलम् कुमारी ङे अलौकिक विग्रह है। यहाँ पर तत्पुरुष समास होता है। समासविधायक सूत्र के विना समास कैसे होगा? इस प्रश्न पर कौमुदीकार लिखते हैं कि द्विगुप्राप्तापन्नालंपूर्वगतिसमासेषु प्रतिषेधो वाच्यः इस वार्तिक में अलं के साथ परवल्लिङ्गता का निषेध किया गया है। यदि समास ही न होता तो परवल्लिङ्गता प्राप्त ही नहीं होती तो निषेध क्यों किया गया। वार्तिककार के निषेध से यह सिद्ध होता है कि अलम् के साथ तत्पुरुष समास की अनुमति है। इसी को ज्ञापन कहते हैं। अलम् कुमारी ङे में ज्ञापकात् तत्पुरुष समास हुआ, उपसर्जनसंज्ञा, पूर्वनिपात, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके परवल्लिङ्गं द्वन्द्वतत्पुरुषयोः से पर के पद कुमारी की तरह स्त्रीलिङ्ग की प्राप्ति थी किन्तु द्विगुप्राप्तापन्नालंपूर्वगतिसमासेषु प्रतिषेधो वाच्यः से उसका निषेध हुआ तो पुरुषः आदि विशेष्य पद के अनुसार ही इसका लिङ्ग बना अर्थात् पुँल्लिङ्ग ही हुआ। यहाँ पर गोस्त्रियोरुपसर्जनस्य से कुमारी को ह्रस्व होता है। अलम् के मकार को अनुस्वार और परसवर्ण होकर अलङ्कुमारि शब्द बन जाता है। सु, रुत्वविसर्ग होकर अलङ्कुमारिः। पञ्चकपालः, प्राप्तजीविकाः, आपन्नजीविकाः, अलङ्कुमारिः ये उदाहारण द्विगुप्राप्तापन्नालंपूर्वगतिसमासेषु प्रतिषेधो वाच्यः इस वार्तिक के हैं। गतिसमास में परवल्लिङ्गता के निषेध का उदाहरण है- निष्कौशाम्बिः। परवल्लिङ्गता होती तो समास के बाद इस शब्द को स्त्रीलिङ्ग ही होना चाहिए था किन्तु इस वार्तिक के कारण अपने विशेष्य पद के अनुसार ही इसका लिङ्ग हुआ।